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Kurukshetra News: 15,818 पांडुलिपियां ज्ञान भारतम पोर्टल पर अपलोड

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 26 May 2026 02:17 AM IST
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15,818 manuscripts uploaded on Gyan Bharatam portal
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कुरुक्षेत्र। धूल से अटी पुरानी अलमारियां, मंदिरों के बंद पड़े कमरे, मठों की लकड़ी की पेटियां और घरों के पुराने संदूक में अब धर्मनगरी का इतिहास तलाशा जा रहा है। जिले में सदियों पुरानी पांडुलिपियों को खोजने और सहेजने का अभियान तेजी पकड़ चुका है। यही वजह है कि 15,818 पांडुलिपियों की पहचान कर कुरुक्षेत्र पूरे प्रदेश में अव्वल बन गया है। जिला प्रशासन और ज्ञान भारतम मिशन के तहत चल रहे इस अभियान में गांव-गांव सर्वे करवाया जा रहा है।

जिले में सर्वे करने के लिए 515 युवा लगाए गए हैं, जो पुराने मंदिरों, मठों, पुस्तकालयों और निजी संग्रहकर्ताओं तक पहुंचकर पांडुलिपियों की तलाश कर रहे हैं। कई जगहों पर ऐसी दुर्लभ पांडुलिपियां मिली हैं, जिन्हें वर्षों से संभालकर रखा गया था, लेकिन उनके महत्व से लोग खुद भी अनजान थे।
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जिले में अब तक श्रीकृष्ण संग्रहालय में 140 और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पांडुलिपि संसाधन एवं संरक्षण केंद्र में 15,678 पांडुलिपियों की पहचान की जा चुकी है। इन सभी को ज्ञान भारतम मिशन पोर्टल पर अपलोड भी कर दिया गया है, ताकि देशभर के शोधकर्ता और विद्यार्थी इन तक आसानी से पहुंच सकें। अभियान से जुड़े अधिकारी बताते हैं कि 75 साल या उससे ज्यादा पुरानी पांडुलिपियों को चिन्हित कर डिजिटाइज किया जा रहा है। इनमें संस्कृत, हिंदी, फारसी समेत कई भाषाओं की धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सामग्री शामिल है। कई पांडुलिपियां ऐसी भी मिली हैं, जिनमें पुराने समय की सामाजिक व्यवस्था, आयुर्वेद, ज्योतिष और शिक्षा पद्धति से जुड़ी जानकारियां दर्ज हैं।
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लघु सचिवालय में सोमवार को आयोजित बैठक में उपायुक्त विश्राम कुमार मीणा ने अधिकारियों के साथ अभियान की समीक्षा की। बैठक से पहले मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए प्रदेशभर में चल रहे संरक्षण कार्य का जायजा लिया और जरूरी दिशा-निर्देश दिए। प्रशासन ने इस अभियान को गांव स्तर तक पहुंचाने के लिए मुनादी भी करवाई है, ताकि लोगों को अपने घरों या संस्थानों में रखी पुरानी पांडुलिपियों के महत्व का पता चल सके। अब प्रशासन की नजर जिले के उन निजी संग्रहों पर भी है, जहां वर्षों से दुर्लभ दस्तावेज सुरक्षित रखे हुए हैं। बैठक में यह भी तय किया गया कि केवल पांडुलिपियों का डिजिटल संरक्षण ही नहीं, बल्कि उनके विषय-वस्तु को आमजन तक पहुंचाने पर भी जोर दिया जाएगा। इसके लिए स्थानीय इतिहासकारों, विद्वानों और सांस्कृतिक संस्थाओं का सहयोग लिया जाएगा। इतिहास और धर्मनगरी के रूप में पहचान रखने वाला कुरुक्षेत्र अब प्राचीन ज्ञान को सहेजने की इस मुहिम में भी प्रदेश का अगुवा बनकर उभर रहा है।
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