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Varanasi News: 133 साल पुरानी नागरीप्रचारिणी सभा में युवा ऊर्जा की दस्तक
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133 साल पुरानी नागरी प्रचारिणी सभा में सोमवार को पंद्रह दिवसीय इंटर्नशिप कार्यक्रम का उद्घाटन किया गया। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से प्राप्त कुल 800 आवेदनों में से केवल 75 सबसे होनहार और योग्य अभ्यर्थियों का चयन इस कार्यक्रम के लिए किया गया है।
आर्यभाषा पुस्तकालय के सभा कक्ष में नवागंतुक प्रशिक्षुओं (इंटर्न्स) को संबोधित करते हुए सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने कहा कि इस महान संस्था की बुनियाद में ही युवता और किशोरावस्था की शक्ति निहित है। सन् 1893 में जिन तीन महान विभूतियों (बाबू श्यामसुंदर दास, पंडित रामनारायण मिश्र और ठाकुर शिवकुमार सिंह) ने सभा की स्थापना की थी, वे उस समय क्वींस कॉलेज की नवीं और बारहवीं कक्षा के युवा विद्यार्थी थे। महज एक डिबेटिंग सोसाइटी बनाने के उनके किशोर स्वप्न ने अपनी अटूट मेहनत और मेधा के दम पर आगे चलकर एक अखिल भारतीय मुकाम हासिल कर लिया।
व्योमेश शुक्ल ने बताया कि किस तरह सभा ने अदालतों में हिंदी भाषा को उसका जायज हक दिलाने के लिए ऐतिहासिक आंदोलन चलाया। इसके अलावा, उन्होंने देश के कोने-कोने से हस्तलिखित हिंदी ग्रंथों की खोज के अभियान, हिंदी शब्दकोश के वृहद निर्माण, रामचरितमानस के सबसे प्रामाणिक संस्करण के ऐतिहासिक प्रकाशन के साथ-साथ कबीर, सूर, जायसी और भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे कालजयी साहित्यकारों की ग्रंथावलियों के प्रकाशन से जुड़ी जानकारियां दीं।
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सात कार्य समूहों में आधुनिक और तकनीकी गुर सीख रहे देश के युवा
इस 15 दिवसीय इंटर्नशिप कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय, बीएचयू, डीएवी पीजी कॉलेज, आर्य महिला पीजी कॉलेज और यूपी कॉलेज के छात्र-छात्राएं शामिल हुए हैं। इन सभी प्रशिक्षुओं को उनकी रुचि और योग्यता के आधार पर सात विशेष वर्किंग ग्रुप्स में बांटा गया है। इस दौरान युवाओं को पारंपरिक पुस्तकालय प्रबंधन के साथ-साथ आधुनिक विधाओं जैसे कैटलॉगिंग, प्राचीन दस्तावेजों की स्कैनिंग, दुर्लभ पत्रिकाओं के निरीक्षण, अंग्रेजी पुस्तकों की सूची तैयार करने, पुस्तक-प्रकाशन की बारीकियों और आज के दौर के सबसे जरूरी सोशल मीडिया प्रबंधन के क्षेत्र में विषय विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
आर्यभाषा पुस्तकालय के सभा कक्ष में नवागंतुक प्रशिक्षुओं (इंटर्न्स) को संबोधित करते हुए सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने कहा कि इस महान संस्था की बुनियाद में ही युवता और किशोरावस्था की शक्ति निहित है। सन् 1893 में जिन तीन महान विभूतियों (बाबू श्यामसुंदर दास, पंडित रामनारायण मिश्र और ठाकुर शिवकुमार सिंह) ने सभा की स्थापना की थी, वे उस समय क्वींस कॉलेज की नवीं और बारहवीं कक्षा के युवा विद्यार्थी थे। महज एक डिबेटिंग सोसाइटी बनाने के उनके किशोर स्वप्न ने अपनी अटूट मेहनत और मेधा के दम पर आगे चलकर एक अखिल भारतीय मुकाम हासिल कर लिया।
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व्योमेश शुक्ल ने बताया कि किस तरह सभा ने अदालतों में हिंदी भाषा को उसका जायज हक दिलाने के लिए ऐतिहासिक आंदोलन चलाया। इसके अलावा, उन्होंने देश के कोने-कोने से हस्तलिखित हिंदी ग्रंथों की खोज के अभियान, हिंदी शब्दकोश के वृहद निर्माण, रामचरितमानस के सबसे प्रामाणिक संस्करण के ऐतिहासिक प्रकाशन के साथ-साथ कबीर, सूर, जायसी और भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे कालजयी साहित्यकारों की ग्रंथावलियों के प्रकाशन से जुड़ी जानकारियां दीं।
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इस 15 दिवसीय इंटर्नशिप कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय, बीएचयू, डीएवी पीजी कॉलेज, आर्य महिला पीजी कॉलेज और यूपी कॉलेज के छात्र-छात्राएं शामिल हुए हैं। इन सभी प्रशिक्षुओं को उनकी रुचि और योग्यता के आधार पर सात विशेष वर्किंग ग्रुप्स में बांटा गया है। इस दौरान युवाओं को पारंपरिक पुस्तकालय प्रबंधन के साथ-साथ आधुनिक विधाओं जैसे कैटलॉगिंग, प्राचीन दस्तावेजों की स्कैनिंग, दुर्लभ पत्रिकाओं के निरीक्षण, अंग्रेजी पुस्तकों की सूची तैयार करने, पुस्तक-प्रकाशन की बारीकियों और आज के दौर के सबसे जरूरी सोशल मीडिया प्रबंधन के क्षेत्र में विषय विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण दिया जा रहा है।