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Siddharthnagar News: नेपाल के धार्मिक स्थलों पर बढ़ी श्रद्धालुओं की भीड़, भंसार पर लग रही कतार
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Fri, 19 Jun 2026 12:28 AM IST
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नेपाल में स्थित स्वर्गद्वारी का प्रवेश द्वार। स्रोत विज्ञप्ति
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ढेबरुआ। नेपाल में धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार बढ़ रही है। इसका साफ असर नेपाल बाॅर्डर पर बने भंसार कार्यालय पर नजर आ रहा है। मौजूदा समय में प्रतिदिन 450 से 500 छोटे और बड़े वाहनों का भंसार बन रहा है और नेपाल में प्रवेश कर रहे हैं। डिजिटल व्यवस्था होने के नाते सहूलियत जरूर है लेकिन नेट न काम करने पर परेशानी बढ़ जा रही है, इसलिए काउंटर की व्यवस्था अब भी संचालित की जा रही है। सुबह काउंटर खुलने से दोपहर 12 बजे तक भंसार कार्यालय पर भीड़ देखी जा रही है।
नेपाल के प्यूठान जिले में स्थित प्रसिद्ध धार्मिक स्थल प्रभू नाथ बाबा धाम में भारत से श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। समुद्र तल से लगभग 2100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस पवित्र मंदिर को हिंदू धर्म में ''''स्वर्ग का द्वार'''' माना जाता है। प्रभुनाथ धाम की यह मान्यता है कि यहां भगवान शिव स्वयं विराजमान हैं, सावन के महीने में जलाभिषेक और रुद्राभिषेक का महत्व कई गुना मिलता है। स्थानीय लोगों के अनुसार इस मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है और यह भारत तथा नेपाल दोनों ही देशों के श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक स्थल है। हिमालय की गोद में पर्वतीय क्षेत्र पर स्थित मंदिर का प्राकृतिक सौंदर्य भी भक्तों को आकर्षित करता है।
विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर, बस्ती, गोंडा, बलरामपुर, महराजगंज और आसपास के जिलों से रोजाना हजारों की संख्या में भक्त नेपाल के बढ़नी बार्डर के रास्ते प्यूठान पहुंच रहे हैं। श्रद्धालु बड़ी संख्या में प्राइवेट वाहनों, बसों, टैक्सियों और मोटरसाइकिलों से यह यात्रा तय कर रहे हैं। सावन के इस पवित्र माह में प्रभू नाथ बाबा के दर्शन को विशेष महत्व दिया जा रहा है, जिसके चलते हर दिन भक्तों की संख्या में इजाफा हो रहा है। बढ़नी बॉर्डर से प्रभुनाथ मंदिर नजदीक है इसलिए इसी बाॅर्डर से लोग ज्यादा आवाजाही करते हैं।
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प्रभू नाथ बाबा धाम को लेकर मान्यता है कि यहां दर्शन करने से विशेष मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। खासकर सावन के महीने में यहां जल चढ़ाने और विशेष पूजा करने की परंपरा रही है। इस धार्मिक यात्रा से न केवल भारत-नेपाल के आपसी संबंधों को मजबूती मिल रही है बल्कि सीमावर्ती इलाकों की स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बड़ा लाभ हो रहा है।
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तीर्थयात्रियों की संख्या में उछाल, भंसार कार्यालय पर कतार
नेपाल में स्थिति भंसार कार्यालय की मंगलवार को व्यवस्था देखी गई तो यहां बड़ी संख्या में लोग भंसार कार्यालय पर जुटे नजर आए। कतार के साथ ही वाहनों का जगह-जगह लगाया गया था। इसमें कुछ लोग तो स्कैन के माध्यम से भंसार कर ले रहे थे। वहीं, जिनका नेटवर्क काम नहीं कर रहा था, उन्हें काउंटर से भंसार के लिए कतार में लगना पड़ रहा था। बलरामपुर से आए राकेश ने बताया कि तीन बाइक से छह लोग प्रभुनाथ दर्शन के लिए जा रहे हैं। सुबह भंसार कार्यालय खुलने से पहले ही पहुंच गए थे। यहां ऑनलाइन भंसार कराना चाहा लेकिन मोबाइल में नेटवर्क न होने से सफल नहीं हो पाया। इस कारण काउंटर पर लाइन में लगे हैं। वहीं, सिद्धार्थनगर के राकेश मौर्य ने बताया कि वह कार से परिवार के साथ जा रहे हैं। उनका भंसार आसानी से हो गया है। दो दिन के भंसार पर जा रहे हैं। वहीं, कार्यालय से जो जानकारी सामने आई, उसमें बताया गया कि प्रतिदिन 450-500 के करीब छोटे और बड़े वाहनों का भंसार हो रहा है।
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पीक सीजन में पहुंचते हैं प्रतिदिन 10 हजार श्रद्धालु
स्वर्गद्वारी आश्रम के अनुसार, प्रतिवर्ष लगभग पांच लाख श्रद्धालु यहां आते हैं। पीक सीजन और गर्मियों के दौरान कई बार एक ही दिन में 10 हजार से अधिक श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे भारतीय राज्यों से बड़ी संख्या में भक्त (विशेष रूप से गोरखपुर, महाराजगंज, बलरामपुर और बस्ती क्षेत्रों से) यहां आते हैं। भीषण गर्मी से बचने और ठंडे, शांत वातावरण का अनुभव करने के लिए भी बड़ी तादाद में पर्यटक और तीर्थयात्री भी यहां पहुंचते हैं।
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मंदिर का प्राचीन इतिहास
मान्यता है कि प्रभु नाथ बाबा के मंदिर की स्थापना गुरु महाराज नारायण खत्री (स्वामी हंसानंद) ने की थी। उन्होंने अपना जीवन हजारों गायों को चराने और दूध दुहकर लोगों में बांटने में बिता दिया। पौराणिक कथाओं के अनुसार उनके कुछ भक्त यह देखने के लिए उनका पीछा करते थे कि वह गायों को चराने कहां लेकर जाते हैं लेकिन वे उन्हें कभी ढूंढ़ नहीं पाए। माना जाता है कि वह रोलपा से वर्तमान मंदिर स्थल पर आए थे और जमींदार से भूमि दान करने को कहा था। इसके बाद उन्होंने जमीन की खोदाई की, जिसमें दही मिश्रित चावल और अग्नि की प्राप्ति हुई। इस पर उन्होंने बताया कि द्वापर युग में पांडवों ने स्वर्ग जाने से पहले इस स्थान पर पूजा कर यह सारी चीजें दफनाई थीं। यह सुनकर जमींदार हैरान रह गया। वह तुरंत जमीन सौंपने को तैयार हो गया। तब से यह पवित्र अग्नि निरंतर जल रही है। बताया जाता है कि पवित्र अग्नि से जलाई गई लकड़ी की राख विभिन्न शारीरिक विकारों को ठीक कर देती है। स्वामी हंसानंद ने शरीर छोड़ने से पहले अपनी कुछ शक्तियां अपने शिष्यों को दीं थी।
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बिना भोजन किए मंदिर से नहीं लौटा कोई
गुरु ने अपने शिष्यों और अन्य अनुयायियों को अलविदा कहने के बाद अपना शरीर छोड़ दिया। उनकी पसंदीदा गायें भी उसी क्षण मर गई। फिर बाकी गायें कुछ ही दिनों में चमत्कारिक रूप से गायब हो गईं। जिस स्थान पर गुरु की मृत्यु हुई थी, उसी समय से गायों के प्रतिदिन स्वयं अपना दूध खाली करने का भी वर्णन मिलता है। उन्होंने अपने जीवनकाल में कई चमत्कार किए थे। एक बार उन्होंने रोलपाली चरवाहों से कहा कि वे मवेशियों को चराने के लिए एक विशेष क्षेत्र में न ले जाएं और उन्हें उस क्षेत्र में एक बड़े भूस्खलन की चेतावनी दें लेकिन उन्होंने इन्कार कर दिया और भूस्खलन से बह गए। वह भक्तों का भाग्य बताते थे। वह इतने दयालु थे कि कोई भी बिना भोजन किए मंदिर से नहीं लौटता था जो परंपरा आज भी चल रही है।
नेपाल के प्यूठान जिले में स्थित प्रसिद्ध धार्मिक स्थल प्रभू नाथ बाबा धाम में भारत से श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। समुद्र तल से लगभग 2100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस पवित्र मंदिर को हिंदू धर्म में ''''स्वर्ग का द्वार'''' माना जाता है। प्रभुनाथ धाम की यह मान्यता है कि यहां भगवान शिव स्वयं विराजमान हैं, सावन के महीने में जलाभिषेक और रुद्राभिषेक का महत्व कई गुना मिलता है। स्थानीय लोगों के अनुसार इस मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है और यह भारत तथा नेपाल दोनों ही देशों के श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक स्थल है। हिमालय की गोद में पर्वतीय क्षेत्र पर स्थित मंदिर का प्राकृतिक सौंदर्य भी भक्तों को आकर्षित करता है।
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प्रभू नाथ बाबा धाम को लेकर मान्यता है कि यहां दर्शन करने से विशेष मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। खासकर सावन के महीने में यहां जल चढ़ाने और विशेष पूजा करने की परंपरा रही है। इस धार्मिक यात्रा से न केवल भारत-नेपाल के आपसी संबंधों को मजबूती मिल रही है बल्कि सीमावर्ती इलाकों की स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बड़ा लाभ हो रहा है।
तीर्थयात्रियों की संख्या में उछाल, भंसार कार्यालय पर कतार
नेपाल में स्थिति भंसार कार्यालय की मंगलवार को व्यवस्था देखी गई तो यहां बड़ी संख्या में लोग भंसार कार्यालय पर जुटे नजर आए। कतार के साथ ही वाहनों का जगह-जगह लगाया गया था। इसमें कुछ लोग तो स्कैन के माध्यम से भंसार कर ले रहे थे। वहीं, जिनका नेटवर्क काम नहीं कर रहा था, उन्हें काउंटर से भंसार के लिए कतार में लगना पड़ रहा था। बलरामपुर से आए राकेश ने बताया कि तीन बाइक से छह लोग प्रभुनाथ दर्शन के लिए जा रहे हैं। सुबह भंसार कार्यालय खुलने से पहले ही पहुंच गए थे। यहां ऑनलाइन भंसार कराना चाहा लेकिन मोबाइल में नेटवर्क न होने से सफल नहीं हो पाया। इस कारण काउंटर पर लाइन में लगे हैं। वहीं, सिद्धार्थनगर के राकेश मौर्य ने बताया कि वह कार से परिवार के साथ जा रहे हैं। उनका भंसार आसानी से हो गया है। दो दिन के भंसार पर जा रहे हैं। वहीं, कार्यालय से जो जानकारी सामने आई, उसमें बताया गया कि प्रतिदिन 450-500 के करीब छोटे और बड़े वाहनों का भंसार हो रहा है।
पीक सीजन में पहुंचते हैं प्रतिदिन 10 हजार श्रद्धालु
स्वर्गद्वारी आश्रम के अनुसार, प्रतिवर्ष लगभग पांच लाख श्रद्धालु यहां आते हैं। पीक सीजन और गर्मियों के दौरान कई बार एक ही दिन में 10 हजार से अधिक श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे भारतीय राज्यों से बड़ी संख्या में भक्त (विशेष रूप से गोरखपुर, महाराजगंज, बलरामपुर और बस्ती क्षेत्रों से) यहां आते हैं। भीषण गर्मी से बचने और ठंडे, शांत वातावरण का अनुभव करने के लिए भी बड़ी तादाद में पर्यटक और तीर्थयात्री भी यहां पहुंचते हैं।
मंदिर का प्राचीन इतिहास
मान्यता है कि प्रभु नाथ बाबा के मंदिर की स्थापना गुरु महाराज नारायण खत्री (स्वामी हंसानंद) ने की थी। उन्होंने अपना जीवन हजारों गायों को चराने और दूध दुहकर लोगों में बांटने में बिता दिया। पौराणिक कथाओं के अनुसार उनके कुछ भक्त यह देखने के लिए उनका पीछा करते थे कि वह गायों को चराने कहां लेकर जाते हैं लेकिन वे उन्हें कभी ढूंढ़ नहीं पाए। माना जाता है कि वह रोलपा से वर्तमान मंदिर स्थल पर आए थे और जमींदार से भूमि दान करने को कहा था। इसके बाद उन्होंने जमीन की खोदाई की, जिसमें दही मिश्रित चावल और अग्नि की प्राप्ति हुई। इस पर उन्होंने बताया कि द्वापर युग में पांडवों ने स्वर्ग जाने से पहले इस स्थान पर पूजा कर यह सारी चीजें दफनाई थीं। यह सुनकर जमींदार हैरान रह गया। वह तुरंत जमीन सौंपने को तैयार हो गया। तब से यह पवित्र अग्नि निरंतर जल रही है। बताया जाता है कि पवित्र अग्नि से जलाई गई लकड़ी की राख विभिन्न शारीरिक विकारों को ठीक कर देती है। स्वामी हंसानंद ने शरीर छोड़ने से पहले अपनी कुछ शक्तियां अपने शिष्यों को दीं थी।
बिना भोजन किए मंदिर से नहीं लौटा कोई
गुरु ने अपने शिष्यों और अन्य अनुयायियों को अलविदा कहने के बाद अपना शरीर छोड़ दिया। उनकी पसंदीदा गायें भी उसी क्षण मर गई। फिर बाकी गायें कुछ ही दिनों में चमत्कारिक रूप से गायब हो गईं। जिस स्थान पर गुरु की मृत्यु हुई थी, उसी समय से गायों के प्रतिदिन स्वयं अपना दूध खाली करने का भी वर्णन मिलता है। उन्होंने अपने जीवनकाल में कई चमत्कार किए थे। एक बार उन्होंने रोलपाली चरवाहों से कहा कि वे मवेशियों को चराने के लिए एक विशेष क्षेत्र में न ले जाएं और उन्हें उस क्षेत्र में एक बड़े भूस्खलन की चेतावनी दें लेकिन उन्होंने इन्कार कर दिया और भूस्खलन से बह गए। वह भक्तों का भाग्य बताते थे। वह इतने दयालु थे कि कोई भी बिना भोजन किए मंदिर से नहीं लौटता था जो परंपरा आज भी चल रही है।