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पिन कोड से तय होती जिंदगी: कहीं पूरी कॉलोनियां नल पर घंटों कतार में खड़ी, कहीं एसी और नियमित पानी का आनंद

patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Fri, 29 May 2026 07:07 AM IST
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हम एक ही शहर में हैं, फिर भी पूरी तरह अलग। कुछ इलाके ज्यादा हरे-भरे हैं, और उनमें छांव भी है। वहीं, कुछ इलाके ऐसे नहीं हैं। यह महज असुविधा नहीं है, बल्कि दशकों की दोषपूर्ण शहरी नियोजन में निहित ढांचागत असमानता है, जो कुछ खास पिन कोड वाले इलाकों को ज्यादा तरजीह देती है।
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Life is determined by pin code Some stand queues for hours at tap while others enjoy air condition and water
दिल्ली जल संकट - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

मई 2026 की झुलसा देने वाली गर्मी में, आपका पिन कोड ही आपके जीवित रहने का पैमाना बन गया है। एक तरफ, 45 डिग्री सेल्सियस की बेरहम धूप में पूरी की पूरी कॉलोनियां एक ही नल पर घंटों कतार में खड़ी रहती हैं; दूसरी तरफ, महज कुछ ही किलोमीटर दूर, हरे-भरे इलाकों में रहने वाले लोग नियमित पानी और एयर-कंडीशनिंग का आनंद उठाते हैं। एक ही शहर, दो अलग-अलग सच्चाइयां। बिजली कटौती से और भी गंभीर हुआ यह संकट शहरी नियोजन की विफलताओं, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की कमजोरी और असमानता की तीखी भौगोलिक हकीकत को उजागर करता है। दक्षिण दिल्ली का ‘दक्षिणपुरी’ इलाका इस खाई को बखूबी दर्शाता है।


लगभग एक महीने से, करीब 5,000 निवासियों को नल से बहुत कम या बिल्कुल भी पानी नहीं मिल रहा है। वहां के लोगों ने बताया कि उन्होंने कई दिनों से ठीक से नहाया भी नहीं है। घरेलू कामगार अपने मालिकों से काम की जगहों पर नहाने की इजाजत मांगते हैं। परिवार एकमात्र चालू नल से मिलने वाले गंदे और खराब गुणवत्ता के पानी के लिए लंबी कतारों में खड़े रहते हैं। बुनियादी स्वच्छता व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। इस प्रचंड गर्मी में, शरीर में पानी की कमी, त्वचा के संक्रमण और लू लगने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इसका सर्वाधिक असर बच्चों व बुजुर्गों पर पड़ रहा है। पर, कुछ ही किलोमीटर दूर, दक्षिणी दिल्ली के हरे-भरे, समृद्ध इलाकों में, जिंदगी सामान्य रूप से चलती रहती है। गर्मी भले ही जानलेवा हो, लेकिन ज्यादातर निवासियों के पास एयर कंडीशनर हैं। पानी का भले संकट हो, किंतु बोरवेल अक्सर पानी की आपूर्ति बनाए रखते हैं, और जनरेटर पंपों और एसी को चालू रखते हैं।


हम एक ही शहर में हैं, फिर भी पूरी तरह अलग। कुछ इलाके ज्यादा हरे-भरे हैं, और उनमें छांव भी है। वहीं, कुछ इलाके (जैसे कि दक्षिणपुरी) ऐसे नहीं हैं। यह महज असुविधा नहीं है, बल्कि दशकों की दोषपूर्ण शहरी नियोजन में निहित ढांचागत असमानता है, जो कुछ खास पिन कोड वाले इलाकों को ज्यादा तरजीह देती है। इस साल पानी का संकट बेहद गंभीर है। दिल्ली में पानी की मांग लगभग 1.25 करोड़ गैलन प्रतिदिन है, जबकि आपूर्ति एक करोड़ गैलन के आसपास ही अटकी हुई है। इससे 25 लाख गैलन का एक लगातार बना रहने वाला अंतर पैदा हो गया है, जो गर्मियों के चरम पर पहुंचने पर और भी बिगड़ जाता है।

भीषण गर्मी की लहर, जिसके कारण संभवतः कम बारिश होगी, ने बोरवेल सुखा दिए हैं, वाष्पीकरण बढ़ा दिया है और घरेलू मांग को आसमान छूने पर मजबूर कर दिया है। बिजली न होने पर पंप व ट्रीटमेंट प्लांट काम करना बंद कर देते हैं, जिससे संकट और बढ़ जाता है। जब देश की राजधानी दिल्ली में ऐसी हालत है, तो जरा सोचिए कि दूसरी जगहों पर क्या हाल होगा। इंदौर हताशा की ऐसी ही समानांतर कहानी बयां करता है। गिरते जलस्तर के कारण यहां के 6,500 सरकारी बोरवेल में से आधे से ज्यादा सूख चुके हैं और निजी बोरवेल में भी इसी तरह की कमी देखी जा रही है। निम्न आय वाले इलाकों के लोग पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर रहते हैं, जो अक्सर अनियमित होते हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी पानी की ऐसी ही किल्लत देखने को मिल रही है, जहां महिलाएं पानी के लिए लंबी दूरी तय करती हैं या घंटों इंतजार करती हैं, क्योंकि पानी ढोने की जिम्मेदारी उन्हीं पर होती है। भारत के पांच शहर (दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बंगलूरू और हैदराबाद) दुनिया के 20 सर्वाधिक जल-संकट वाले शहर हैं।

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के मुताबिक, पानी की खराब गुणवत्ता बच्चों की सेहत के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। इसकी वजह से 14 साल से कम उम्र के करीब 80 लाख बच्चे खतरे में हैं। हरियाली की असमानता पानी के संकट को और भी जानलेवा बना देती है। अमीर कॉलोनियों को घने पेड़ों, पार्कों और छायादार रास्तों का फायदा मिलता है, जो वहां के तापमान को 4-8 डिग्री सेल्सियस तक कम कर सकते हैं। दिल्ली के दक्षिणपुरी या संगम विहार जैसे घनी आबादी वाले और कम आय वाले इलाके कंक्रीट के बंजर ‘हीट आइलैंड’ (गर्मी के टापू) बन गए हैं, जहां नाममात्र की हरियाली है। रातें भी कोई खास राहत नहीं देतीं और घर भट्ठी जैसे गर्म हो जाते हैं। इससे सड़क किनारे ठेला लगाने वाले, मजदूर और घरेलू कामगार सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। पानी की कमी के कारण उन्हें अपनी कमाई महंगे टैंकरों से पानी लेने के लिए खर्च करनी पड़ती है या बीमारी का खतरा मोल लेना पड़ता है। बिना छाया वाले फुटपाथों पर सामान बेचने वालों की आय में भारी गिरावट आई है, क्योंकि ग्राहक घरों से नहीं निकलते। असंगठित क्षेत्र, जो भारत के 80 फीसदी से अधिक कार्यबल को आजीविका प्रदान करता है और जिसके पास पहले से ही कोई सुरक्षा कवच नहीं है, उसे उत्पादकता, स्वास्थ्य और कमाई में लगातार हो रहे नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। साफ है कि भारत में शहरों का जल संकट कोई दुर्भाग्यपूर्ण मौसमी घटना नहीं है। ये ऐसी अनुमानित और लोगों की पैदा की हुई आपदाएं हैं, जो खराब शहरी नियोजन का नतीजा हैं। जलवायु परिवर्तन और लू की लहरें इन्हें निर्मम तरीके से और तीव्र कर देती हैं।

जैसे-जैसे लू की लहरें लंबी और ज्यादा बार आने लगेंगी, पानी, बिजली, अत्यधिक गर्मी और अनौपचारिक व्यवस्थाओं की आपस में जुड़ी विफलताएं शहरों की बेरहमी से परीक्षा लेंगी। जाहिर है, शहरी नियोजन में एक बड़े बदलाव की जरूरत है, जिसके तहत गर्मी की चपेट में आने वाली अनौपचारिक बस्तियों में ‘ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर’, यानी पानी के स्रोतों को ठीक करना, ठंडी छतें, और बड़े पैमाने पर शहरी हरियाली को अनिवार्य रूप से प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके अलावा, अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण और वर्षा जल संचयन को बड़े पैमाने पर बढ़ाया जाए। पारदर्शी व निष्पक्ष पानी वितरण के लिए स्मार्ट मीटरिंग की जाए तथा पानी की बर्बादी रोकी जाए। विद्युत प्रणालियों को नवीकरणीय ऊर्जा और भंडारण के साथ एकीकृत करना चाहिए, ताकि बिजली कटौती के कारण जल आपूर्ति ठप न हो पाए।

अनौपचारिक अर्थव्यवस्था, यानी छोटे कामकाज और रोज कमाने वाले लोगों के लिए छाया वाले वेंडिंग जोन बनाए जाने चाहिए। तेज गर्मी के समय सरकार को सीधे आर्थिक मदद देने वाली ‘हीट एक्शन प्लान’ योजनाएं और रोजगार बढ़ाने के लिए विशेष कौशल कार्यक्रम शुरू करने चाहिए। दिल्ली और राज्य सरकारों को अपडेटेड मास्टर प्लान लागू करने चाहिए, जिनमें पानी और छाया को ‘अनिवार्य’ माना जाए और सबसे गरीब इलाकों को प्राथमिकता दी जाए। जब तक नीति-निर्माता इस सोच को पूरी तरह आत्मसात नहीं कर लेते, तब तक दक्षिणपुरी जैसी समस्याएं विभाजित व खराब ढंग से नियोजित शहरों की सच्चाई को उजागर करती रहेंगी।    
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