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मुद्दा: शिक्षक हैं, शिक्षक ही रहने दें; पर अभियानों से कैसे बचें
नीरज तिवारी
Published by: Pavan
Updated Wed, 27 May 2026 08:37 AM IST
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जनगणना और एसआईआर जैसे तमाम सरकारी अभियान हैं, जिनकी पूर्णाहुति शिक्षकों के बगैर संभव नहीं। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था डगमगाएगी ही।
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शिक्षक हैं, शिक्षक ही रहने दें
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विस्तार
मतदाता सूची दुरुस्त करानी हो, चुनाव कराना हो या कोई और सरकारी अभियान चलाना हो...हर ताले की एक ही चाबी है शिक्षक। जिन शिक्षकों पर देश का भविष्य गढ़ने, जिम्मेदार नागरिकों की पौध तैयार करने का महत्वपूर्ण जिम्मा हो, उन्हें हम सम्मान और आत्मविश्वास से लबरेज ऊर्जावान शख्सियत के रूप में ही देखना चाहेंगे, क्योंकि शिक्षक के अनुरूप ही बच्चों के व्यक्तित्व का विकास होगा। दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसा है नहीं।ताजा प्रसंग जनगणना से जुड़ा है। प्राथमिक के साथ माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों को भी इसमें लगा दिया गया है। मई में स्कूल बंद होने तक शिक्षण कार्य देखने के लिए प्रधानाचार्य तक नहीं बचे। बेसिक शिक्षा अधिकारी और जिला विद्यालय निरीक्षक भी यह कहकर पल्ला झाड़ते हैं कि मानव संपदा पोर्टल पर उपलब्ध डाटा से ड्यूटी लगाई गई है। इसमें वे कुछ नहीं कर सकते। नतीजतन कई विद्यालय शिक्षकविहीन हो गए, तो कई में गिने-चुने शिक्षक ही सैकड़ों बच्चों को संभालते हैं। शिक्षकों के जनगणना प्रशिक्षण में लगने से 'स्कूल चलो अभियान' भी परवान नहीं चढ़ पाया।
शिक्षकों के प्रशिक्षण में जाने से इस बार ड्रॉप आउट और नए बच्चों को दाखिला भी नहीं दिलाया जा सका। इससे पहले मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान भी ऐसा ही हुआ। कोई किसी की सुनने को तैयार न था। शिक्षक दो पाटों के बीच पिसते रहे। मतगणना और एसआईआर महज दो नजीरें हैं। ऐसे तमाम सरकारी अभियान हैं, जिनकी पूर्णाहुति शिक्षकों के बगैर संभव ही नहीं मानी जाती। ऐसे में सरकार सार्वजनिक शिक्षण व्यवस्था को कॉन्वेंट शिक्षा के मुकाबले कैसे मजबूत करेगी? विकसित देशों में शिक्षकों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। सनातन संस्कृति में भी गुरु (शिक्षक) को गोविंद (ईश्वर) से ऊपर मान्यता प्राप्त है, पर जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट नजर आती है। अस्सी और नब्बे के दशक में शिक्षकों को मामूली वेतन मिलता था। वह भी तीन-तीन, छह-छह माह बाद। सरकारों के पास तब वेतन के लिए बजट तक नहीं होता था, लेकिन शिक्षकों के समर्पण में कोई कमी नहीं। उस दौर के पढ़े तमाम आईएएस-आईपीएस अफसर हैं, जो अपनी पढ़ाई सरकारी विद्यालयों से होने का जिक्र कर गर्व से भर उठते हैं।
ऐसे अफसरों से उम्मीद यही की जानी चाहिए कि शिक्षकों के प्रति जो सम्मान इनके मन-मस्तिष्क में है, उसे वह नई पीढ़ी के दिलोदिमाग में भी गहराई तक पहुंचाने की कोशिश करें। लेकिन संभवत: अफसर भी मजबूर हैं। सत्ताधीशों को शायद यह समझ में नहीं आ रहा है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं ही नहीं, बल्कि जमीन पर भी काम होना चाहिए। कस्बों में चल रहे निजी विद्यालयों के पास न मानक के अनुरूप शिक्षक हैं और न ही भवन, पर वे सरकारी शिक्षण व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। ये हालात तब हैं, जब सम्मानजनक वेतनमान के साथ मानक के अनुरूप प्रशिक्षित शिक्षक भी सरकारी सेवा में हैं। हालांकि बीते कुछ वर्षों में छात्र-शिक्षक अनुपात सुधरा है। यूडायस पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में देशभर में कुल 1.01 करोड़ शिक्षक हैं, जिन पर 24.69 करोड़ बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी है। इनमें से 50.87 फीसदी शिक्षक सरकारी विद्यालयों के हैं। कुल संख्या के 49.24 फीसदी बच्चों का भविष्य इन्हीं के हाथ है।
अभिभावकों की मंशा यह होती है कि उनका बच्चा नियमित विद्यालय जाए, पर सरकारी विद्यालयों में आए दिन किसी न किसी कार्यक्रम के चलते व्यवधान उन्हें खटकता है। इसी वजह से अप्रशिक्षित शिक्षक और मानकविहीन भवन होने के बावजूद निजी विद्यालय सफल हो रहे हैं। बच्चों का रुझान सरकारी विद्यालयों की ओर बढ़े, इसके लिए सरकार को चाहिए कि वह शिक्षकों को पढ़ाई से इतर कार्यों से दूर ही रखे।
सरकार उन कर्मचारियों को इन कामों में लगा सकती है, जो फील्ड से जुड़े काम कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों पर सरकार ने ध्यान केंद्रित कर सरकारी विद्यालयों को कॉन्वेंट जैसा स्वरूप देने की पहल की। सुधार की तमाम योजनाएं चला कर स्कूलों का कायाकल्प किया। लेकिन अब तक उसके सकारात्मक नतीजे नहीं आए हैं। जब तक शिक्षकों को नियमित शिक्षण कार्य से जोड़े रखने की चेतना नहीं आएगी, सरकारी शिक्षा व्यवस्था यों ही डगमगाती रहेगी। इसके लिए भी पहल शासन को ही करनी होगी। पढ़-लिखकर नीति निर्धारण के लायक बने अफसरों को भी शिक्षण कार्य की गंभीरता को समझना होगा। सबकी सोच यही होनी चाहिए कि जो शिक्षक हैं, उन्हें शिक्षक ही बने रहने दें।