Explainer: मिलते भाजपा के नेताओं से रहे, विलय NCPI में क्यों कर लिया; टीएमसी के बागियों की ये कैसी रणनीति?
टीएमसी के 20 बागी सांसदों ने सीधे भाजपा में जाने के बजाय एनसीपीआई में विलय का रास्ता चुना है। बागी गुट का दावा है कि उनके साथ दो-तिहाई से अधिक सांसद हैं, जबकि टीएमसी नेतृत्व इस दावे को कानूनी चुनौती दे रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह विलय बागी सांसदों को कानूनी सुरक्षा दिलाएगा और क्या वे वास्तव में टीएमसी के नाम व चुनाव चिह्न पर दावा कर पाएंगे? आइए विस्तार से जानते हैं।
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अब ये कहा जा रहा है कि जोड़ा फूल (टीएमसी का चुनाव चिह्न) और कमल (भाजपा का चुनाव चिह्न) की बात में पेन की सात किरणों (एनसीपीआई का चुनाव चिह्न) में 20 सांसदों वाली ऐसी चमक आई है जिसके चलते ये गुमनाम दल लोकसभा में पांचवां सबसे बड़ा दल बनने की स्थिति में पहुंच गया है।
आखिर ये एनसीपीआई क्या है? इस पार्टी का चुनावी इतिहास क्या रहा है? बागियों ने इस पार्टी में विलय का रास्ता क्यों चुना? अब आगे ये गुट कैसे टीएमसी के चुनाव चिह्न पर दावा करने की बात कर रहा है? इस टूट के बाद एनडीए को क्या फायदा मिल सकता है? आइए विस्तार से जानते है।
पूरा मामला क्या है?
रविवार को काकोली घोष दस्तीदार, सुदीप बंदोपाध्याय और शताब्दी रॉय समेत बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की। इसके बाद काकोली घोष ने दावा किया कि टीएमसी के 20 सांसद उनके साथ हैं और उन्होंने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (एनसीपीआई) में विलय का फैसला कर लिया है। बागी गुट का कहना है कि वे अब NDA के साथ मिलकर काम करेंगे।ये एनसीपीआई क्या है?
एनसीपीआई त्रिपुरा का एक पंजीकृत गैर-मान्याप्राप्त दल है। इस पार्टी का गठन 2022 में हुआ था। शिउली कुंडू इसकी संस्थापक अध्यक्ष हैं। 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इस पार्टी ने दो सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। दोनों ही उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। एनसीपीआई का चुनाव चिन्ह पेन की नीब और सात किरणें हैं।उनाकोटी जिले की कैलाशहर सीट से चुवाव लड़े जहांगीर अली को 285 वोट मिले थे। यहां टीएमसी उम्मीदवार को एनसीपीआई के उम्मीदवार को से ज्यादा (692) वोट मिले थे। वहीं, धलाई जिले की चावमानु सीट से चुनाव लड़े बरजेदा त्रिपुरा को 536 वोट से संतोष करना पड़ा था। बरजेदा से जब अमर उजाला ने टीएमसी के बागी विधायकों के विलय के संबंध में बात की तो उन्होंने कहा कि उन्हें भी मीडिया के जरिए इस विलय के बारे में पता चला। बरजेदा खुद को पार्टी के संस्थापक सदस्यों में बताते हैं।
टीएमसी के बागियों ने इस गुमनाम दल में विलय का रास्ता क्यों चुना?
बगियों ने दल बदल कानून से बचने के लिए एनसीपीआई में विलय का रास्ता चुना। साथ ही बागी असली टीमसी का दावा करने के लिए समय चाहते थे। दरअसल, दसवीं अनुसूची के पैरा 4 में कहा गया है कि विलय के मामले में दल-बदल के आधार पर अयोग्यता लागू नहीं होती है। किसी सदन के सदस्य की मूल राजनीतिक पार्टी का विलय तब माना जाता है जब संबंधित विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य ऐसे विलय के लिए सहमत हों।इस मामले में बागी गुट के नेता सुदीप बंदोपाध्याय का कहना है कि हमने एनसीपीआई में विलय किया है। जो एक राजनीतिक दल है। जब पार्टी के दो-तिहाई विधायीदल अलग होता है तो आप पहले ही दिन पार्टी के नाम पर दावा नहीं कर सकते है। बंधोपाध्याय कहते हैं कि जुलाई में जब संसद सत्र शुरू होगा तब हम तृणमूल पर दावा पेश करेंगे। तब कोर्ट तय करेगा कि असली टीएमसी कौन है।
टीएमसी के बागी सांसदों पर दल-बदल कानून क्यों नहीं लगेगा?
संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार अगर किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई सांसद या विधायक सामूहिक रूप से किसी दूसरी पार्टी में विलय का फैसला करते हैं तो इसे दल-बदल नहीं माना जाता। इसका सबसे ताजा उदाहरण राज्यसभा में देखने को मिला था। जब 10 सदस्यों वाली आम आदमी पार्टी के सात सांसदों ने मुख्य पार्टी से खुद को अलग करके आम आदमी पार्टी संसदीय दल का विलय भाजपा में कर लिया था। खुद को असली पार्टी बताने का दावा भी ये सांसद कर सकते हैं। इसका उदाहरण 2022 में महाराष्ट्र में देखने को मिला था। जब शिवसेना से दो-तिहाई से ज्यादा विधायकों ने उद्धव ठाकरे से बगावत करके अपना अलग गुट बना लिया था। बाद में भाजपा के समर्थन से राज्य की सत्ता में आ गए थे। इतना ही नहीं इस बागी गुट ने विधानसभा के साथ लोकसभा और राज्यसभा में भी ये करके, खुद के असली शिवसेना होने की लड़ाई भी जीती थी।टीएमसी के लोकसभा में 28 सांसद हैं। दो-तिहाई संख्या लगभग 19 सांसदों की बनती है। बागी गुट का दावा है कि उनके साथ 20 सांसद हैं। अगर यह संख्या सही साबित होती है और स्पीकर इसकी पुष्टि कर देते हैं तो ये सांसद कानूनी रूप से यह तर्क दे सकते हैं कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से पार्टी नहीं छोड़ी बल्कि एक वैध सामूहिक विलय किया है। ऐसी स्थिति में उनकी सदस्यता बच सकती है।
क्या पहले भी कभी ऐसा हुआ है?
2016 में अरुणाचल प्रदेश में भी इस तरह का मामला देखने को मिला था। जब मुख्यमंत्री नबाम तुकी को छोड़कर पूरा विधायक दल पीपल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल में शामिल हो गया था। ये दल भाजपा के नेतृत्व वाले नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस का हिस्सा था। इसके चलते राज्य से कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। 31 दिसंबर 2016 को मुख्यमंत्री पेमा खांडू और अन्य 32 विधायक पीपल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल को छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। इसके साथ ही राज्य में पहली बार भाजपा की सरकार बनी थी। पेमा खांडू और साथियों के इस कदम के बाद 60 सदस्यों वाली राज्य विधानसभा में भाजपा विधायकों की संख्या 45 हो गई थी। वहीं, पीपीए के विधायकों संख्या 10 रह गई। वहीं, विधानसभा चुनाव जीतकर सरकार बनाने वाली कांग्रेस महज तीन सीटों पर सिमट गई थी।
भाजपा में अभी विलय क्यों नहीं हुआ?
सूत्रों का कहना है कि भाजपा भी तृणमूल को तोड़ने का आरोप अपने सिर पर नहीं लेना चाहती है। इसके साथ ही बगावत करने वाले गुट में शामिल कुछ सांसद ऐसे भी हैं जो पार्टी की पसंद भी नहीं हैं। यह भी एक वजह रही जिसके चलते भाजपा में बागियों का विलय नहीं किया गया। जबकि, कुछ दिन पहले ही आम आदमी पार्टी के राज्यसभा के बागियों का भाजपा में ही विलय किया गया है।