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क्या जनता की जेब पर बढ़ेगा बोझ?: होर्मुज संकट से बढ़ी महंगाई की मार, उद्योगों की लागत ने बढ़ाई सरकार की चिंता

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Thu, 28 May 2026 05:35 AM IST
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सार
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पश्चिम एशिया संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण भारत में उद्योगों की लागत तेजी से बढ़ रही है। कच्चे तेल, गैस और धातुओं की कीमतों में उछाल से महंगाई बढ़ने का खतरा गहरा गया है। क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार कंपनियां बढ़ती लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल सकती हैं। आइए, विस्तार से क्रिसिल की रिपोर्ट पर नजर डालते हैं...

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क्रिसिल की रिपोर्ट ने बढ़ाई सरकार की चिंता - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

पश्चिम एशिया संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल, गैस और दूसरे ऊर्जा उत्पादों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी से भारतीय उद्योगों की लागत तेजी से बढ़ रही है। इसका असर अब आम लोगों की जेब पर भी पड़ने की आशंका है। स्टील, प्लास्टिक, उर्वरक, रसायन, सिंथेटिक रबर और धातु उद्योगों में उत्पादन महंगा हो गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सरकार ने जल्द टैक्स में राहत और आयात नियंत्रण जैसे कदम नहीं उठाए, तो आने वाले महीनों में महंगाई और बढ़ सकती है। बढ़ती लागत के कारण कंपनियां धीरे-धीरे उत्पादों के दाम बढ़ाने की तैयारी में हैं।


आखिर क्यों बढ़ रही है उद्योगों की लागत?
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा रास्ता माना जाता है। यहां संकट बढ़ने से तेल और गैस की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं। इसका सीधा असर भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों पर पड़ रहा है। उद्योगों में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल तेजी से महंगा हो रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2026 में तांबे की कीमत में 17.3 फीसदी और एल्युमीनियम में 20.6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। वहीं क्रूड उत्पादों की कीमत करीब 49.3 फीसदी तक बढ़ गई। इससे फैक्ट्रियों की उत्पादन लागत बढ़ती जा रही है।
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कच्चा माल

अप्रैल 2026 में बढ़ोतरी

तांबा

17.3%

एल्युमीनियम

20.6%

क्रूड उत्पाद

49.3%

गैस उत्पाद

19.1%


क्या महंगाई और बढ़ने वाली है?
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की रिपोर्ट ने सरकार और आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर आने वाले समय में पश्चिम एशिया का तनाव कम भी हो जाए, तब भी कच्चे माल की कीमतें जल्दी नीचे नहीं आएंगी। अप्रैल 2026 में थोक महंगाई दर बढ़कर 8.3 फीसदी पहुंच गई, जबकि मार्च में यह 3.9 फीसदी थी। गैर-खाद्य थोक महंगाई 10.9 फीसदी तक पहुंच गई है। इसका मतलब है कि उद्योगों पर लागत का दबाव लगातार बढ़ रहा है। कंपनियां अब अपना मुनाफा बचाने के लिए धीरे-धीरे बढ़ी हुई लागत ग्राहकों पर डाल सकती हैं। इससे खाने-पीने से लेकर रोजमर्रा के सामान तक महंगे हो सकते हैं।
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क्या टैक्स में राहत से मिल सकती है राहत?
थिंक चेंज फोरम ने सरकार को सुझाव दिया है कि उद्योगों को टैक्स में राहत दी जाए और गैर-जरूरी आयात पर नियंत्रण लगाया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे घरेलू उद्योगों को मजबूती मिलेगी और विदेशी मुद्रा पर दबाव कम होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि विलासिता की गैर-जरूरी वस्तुओं के आयात को सीमित करना जरूरी है। साथ ही इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर खत्म कर टैरिफ व्यवस्था को आसान बनाने की जरूरत है। इससे देश के उद्योगों को राहत मिल सकती है और रुपये पर दबाव कम होगा। सरकार के सामने चुनौती यह है कि महंगाई भी नियंत्रित रहे और उद्योग भी चलते रहें।

आम लोगों की जेब पर कितना असर पड़ेगा?
विशेषज्ञों का कहना है कि उद्योगों की बढ़ती लागत का असर जल्द ही खुदरा बाजार में दिखाई देगा। कंपनियां पहले कुछ समय तक नुकसान सहन करती हैं, लेकिन लंबे समय तक ऐसा संभव नहीं होता। ऐसे में रोज इस्तेमाल होने वाले सामान, वाहन, निर्माण सामग्री, गैस सिलेंडर और प्लास्टिक उत्पाद महंगे हो सकते हैं। अगर ईंधन की कीमतें ऊंची बनी रहीं तो परिवहन लागत भी बढ़ेगी, जिससे सब्जियों और खाद्य पदार्थों के दाम भी प्रभावित हो सकते हैं। इससे आम परिवारों का घरेलू बजट बिगड़ने की आशंका बढ़ गई है।

सरकार के सामने कितनी बड़ी चुनौती?
सरकार के सामने इस समय दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। एक तरफ उद्योगों को राहत देना जरूरी है, दूसरी तरफ आम लोगों को महंगाई से बचाना भी जरूरी है। क्रिसिल के मुताबिक इनपुट-आउटपुट अनुपात लगातार 44 महीनों तक नीचे रहने के बाद अप्रैल में फिर 1.0 के पार पहुंच गया है। इसका मतलब है कि उत्पादन लागत तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया संकट लंबा खिंचता है तो भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव और बढ़ सकता है। ऐसे में सरकार को जल्द संतुलित आर्थिक फैसले लेने होंगे।
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