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Bareilly News: नायलान मांझे से कस रहा गला, सिमट रहा पारंपरिक कारोबार
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बरेली। प्रतिबंधित जानलेवा (नायलाॅन) मांझे से लोगों का गला कस रहा है। दूसरी ओर, बरेली का पारंपरिक कारोबार सिमट रहा है। प्रशासन के सामने इस खूनी मांझे की बिक्री रोकने के साथ ही पारंपरिक उद्योग को बचाने की दोहरी चुनौती है।
बरेली सूती मांझा निर्माण का प्रमुख केंद्र है। करीब 50 हजार लोग इस कुटीर उद्योग से जुड़े हैं। तैयार होने वाला पारंपरिक मांझा देश के कई बड़े शहरों के साथ दुबई, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा तक भेजा जाता है, पर सस्ते दर पर ऑनलाइन मिल रहे नॉयलान मांझे ने कारोबारियों और कारीगरों की चिंता बढ़ा दी है। बाकरगंज स्थित ईदगाह के पास कारोबार करने वाले मांझा मजदूर कल्याण समिति के अध्यक्ष अरशद हुसैन के मुताबिक, नाॅयलान मांझे को ही चीनी मांझा कहते हैं। यह मछली पकड़ने वाले नाॅयलान के धागे से बनता है। इस पर लोहे और शीशे का बुरादा चढ़ाया जाता है, जो इसे धारदार बनाता है। बंगलूरू, सूरत में फैक्टरी संचालन की आशंका जताई। ऑनलाइन बिक्री से बिक्री भी बढ़ गई है। कारोबारियों के मुताबिक पारंपरिक सूती मांझा तैयार करने में मेहनत और समय अधिक लगता है, जबकि मशीनों से तैयार नायलाॅन मांझा सस्ते दामों पर मिलता है।
ब्लेड, डॉलफिन, सार्क जैसे नाम से हो रही बिक्री
ई-कॉमर्स एप पर ब्लेड, डॉलफिन, सार्क समेत अन्य कई नाम से नायलॉन मांझे की बिक्री की जा रही है। इसकी कीमत एक हजार से डेढ़ हजार रुपये प्रति किलो तक है। गुणवत्ता और लंबाई के आधार पर कीमतें अलग-अलग होती है। विक्रेता इस पर डिस्काउंट ऑफर भी दे रहे हैं। ऑनलाइन बिक्री में इसे मोनोफिलामेंट लाइन फिशिंग सी नाइट बताते हैं।
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हजारों परिवारों के सामने जीवन यापन का संकट
सरायखाम निवासी इनाम अली बताते हैं कि देसी मांझे का कारोबार आज भी हजारों परिवारों की रोजी-रोटी का आधार है। हुसैन बाग, बाकरगंज, किला, छावनी, स्वालेनगर, मठ, सनऊआ, सीबीगंज, बादशाह नगर और भोजीपुरा समेत कई इलाकों में बड़े स्तर पर देसी मांझा तैयार किया जाता है। बरेली के मांझे की मांग जयपुर, सूरत, अहमदाबाद, मुंबई, कोलकाता, लखनऊ समेत देश के अन्य कई शहरों में भी है।
बरेली सूती मांझा निर्माण का प्रमुख केंद्र है। करीब 50 हजार लोग इस कुटीर उद्योग से जुड़े हैं। तैयार होने वाला पारंपरिक मांझा देश के कई बड़े शहरों के साथ दुबई, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा तक भेजा जाता है, पर सस्ते दर पर ऑनलाइन मिल रहे नॉयलान मांझे ने कारोबारियों और कारीगरों की चिंता बढ़ा दी है। बाकरगंज स्थित ईदगाह के पास कारोबार करने वाले मांझा मजदूर कल्याण समिति के अध्यक्ष अरशद हुसैन के मुताबिक, नाॅयलान मांझे को ही चीनी मांझा कहते हैं। यह मछली पकड़ने वाले नाॅयलान के धागे से बनता है। इस पर लोहे और शीशे का बुरादा चढ़ाया जाता है, जो इसे धारदार बनाता है। बंगलूरू, सूरत में फैक्टरी संचालन की आशंका जताई। ऑनलाइन बिक्री से बिक्री भी बढ़ गई है। कारोबारियों के मुताबिक पारंपरिक सूती मांझा तैयार करने में मेहनत और समय अधिक लगता है, जबकि मशीनों से तैयार नायलाॅन मांझा सस्ते दामों पर मिलता है।
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ब्लेड, डॉलफिन, सार्क जैसे नाम से हो रही बिक्री
ई-कॉमर्स एप पर ब्लेड, डॉलफिन, सार्क समेत अन्य कई नाम से नायलॉन मांझे की बिक्री की जा रही है। इसकी कीमत एक हजार से डेढ़ हजार रुपये प्रति किलो तक है। गुणवत्ता और लंबाई के आधार पर कीमतें अलग-अलग होती है। विक्रेता इस पर डिस्काउंट ऑफर भी दे रहे हैं। ऑनलाइन बिक्री में इसे मोनोफिलामेंट लाइन फिशिंग सी नाइट बताते हैं।
हजारों परिवारों के सामने जीवन यापन का संकट
सरायखाम निवासी इनाम अली बताते हैं कि देसी मांझे का कारोबार आज भी हजारों परिवारों की रोजी-रोटी का आधार है। हुसैन बाग, बाकरगंज, किला, छावनी, स्वालेनगर, मठ, सनऊआ, सीबीगंज, बादशाह नगर और भोजीपुरा समेत कई इलाकों में बड़े स्तर पर देसी मांझा तैयार किया जाता है। बरेली के मांझे की मांग जयपुर, सूरत, अहमदाबाद, मुंबई, कोलकाता, लखनऊ समेत देश के अन्य कई शहरों में भी है।