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हिमाचल: रणसिंघा, काष्ठ कला और हस्तनिर्मित गलीचा को मिला जीआई टैग, कारीगरों को भी मिलेगा नया बाजार

अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Tue, 16 Jun 2026 05:00 AM IST
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सार
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प्रदेश के तीन पारंपरिक उत्पादों को जीआई (भौगोलिक संकेतक) टैग मिला है। इनमें रणसिंघा, वुड कार्विंग क्राफ्ट (काष्ठ कला) और हस्तनिर्मित गलीचा शामिल हैं।

Himachal: Ransingha, woodcraft, and handmade carpets receive GI tags.
रणसिंघा, काष्ठ कला और हस्तनिर्मित गलीचा। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

हिमाचल प्रदेश के तीन पारंपरिक उत्पादों को जीआई (भौगोलिक संकेतक) टैग मिला है। इनमें रणसिंघा, वुड कार्विंग क्राफ्ट (काष्ठ कला) और हस्तनिर्मित गलीचा शामिल हैं। इस उपलब्धि से न केवल प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षण मिलेगा, बल्कि इन उत्पादों से जुड़े हजारों कारीगरों और शिल्पकारों के लिए आर्थिक अवसरों के नए द्वार भी खुलेंगे। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के हिमाचल प्रदेश क्षेत्रीय कार्यालय की पहल से यह पंजीकरण संभव हो सका है। इस प्रक्रिया में स्थानीय उत्पादक समूहों और कारीगर संगठनों ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। जीआई टैग मिलने से इन उत्पादों की विशिष्ट पहचान को कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा और इनके नाम और स्वरूप की नकल या दुरुपयोग पर रोक लगेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग मिलने के बाद इन उत्पादों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अलग पहचान मिलेगी, जिससे उनकी मांग और बाजार मूल्य में वृद्धि होगी। इससे स्थानीय कारीगरों की आय बढ़ाने और पारंपरिक शिल्प को प्रोत्साहन देने में मदद मिलेगी।

उत्पादों का महत्व और विशिष्टता

रणसिंघा हिमाचल की सांस्कृतिक परंपराओं का अभिन्न हिस्सा है। सदियों से इसका उपयोग धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों में किया जाता रहा है। वहीं, वुड कार्विंग क्राफ्ट प्रदेश की उत्कृष्ट काष्ठकला और मंदिर वास्तुकला का प्रतीक माना जाता है। इसकी बारीक नक्काशी, पारंपरिक डिजाइन और कलात्मक कौशल इसे विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं। हस्तनिर्मित गलीचा हिमाचल के पारंपरिक बुनाई उद्योग की अमूल्य धरोहर है और ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक परिवारों की आजीविका का प्रमुख साधन भी है।

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यह लाभ होगा

जीआई टैग मिलने के बाद इन उत्पादों के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे। अधिकृत उपयोगकर्ता पंजीकरण और आकर्षक ब्रांडिंग पर भी ध्यान दिया जाएगा। आधुनिक पैकेजिंग और कौशल विकास जैसी गतिविधियों को गति मिलेगी। बाजार विस्तार के प्रयासों से इन उत्पादों को नई पहचान मिलेगी। इससे हिमाचल के पारंपरिक उत्पादों को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि वैश्विक बाजारों में भी पहचान मिलने की उम्मीद है।

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यह प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। नाबार्ड भविष्य में भी उत्पादक समूहों को मूल्य श्रृंखला विकास, ब्रांडिंग, विपणन और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में सहयोग देता रहेगा। साथ ही बाजार से जोड़ने के लिए निरंतर सहायता प्रदान की जाएगी। - विवेक पठानिया, मुख्य महाप्रबंधक, क्षेत्रीय कार्यालय नाबार्ड

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