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यूपी: शिक्षामित्रों का खत्म हुआ नौ साल का वनवास, 35-40 हजार से सीधे 10 हजार रुपये मानदेय पर आ गए थे

अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: आकाश द्विवेदी Updated Sat, 21 Feb 2026 09:01 AM IST
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सार

विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की घोषणा के बाद शिक्षामित्रों का नौ साल का संघर्ष समाप्त हुआ। 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा समायोजन निरस्त होने के बाद उनका मानदेय घटकर 10 हजार रह गया था। अब सरकार ने इसे लगभग दोगुना करने और कैशलेस चिकित्सा सुविधा देने का फैसला किया है।

UP: Shikshamitras' nine-year exile ends, honorarium dropped from Rs 35,000-40,000 to Rs 10,000
प्रतीकात्मक फोटो - फोटो : AI
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विस्तार

विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा शिक्षामित्रों व अनुदेशकों का मानदेय बढ़ाने की घोषणा के साथ ही शिक्षामित्रों का लगभग नौ साल का वनवास खत्म हुआ। पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट से समायोजन निरस्त होने के बाद 2017 में वे अचानक 35-40 हजार से सीधे 10 हजार रुपये मानदेय पर आ गए थे। तबसे वे मानदेय बढ़ाने के लिए आंदोलनरत हैं।

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प्रदेश में वर्ष 1999 में सर्व शिक्षा अभियान के तहत प्रदेश के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षामित्रों को रखने की शुरुआत की गई थी। पहले यह सीमित संख्या में थे। बाद में आगे चलकर 2005-06 में इनकी संख्या लगभग दोगुनी की गई थी। यह लगभग 2009 तक बढ़ी संख्या में स्कूलों में पठन-पाठन के लिए तैनात किए गए थे। बाद में इनको आवश्यक ट्रेनिंग दिलाकर दो चरणों में नियमित किया गया।
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इस तरह प्रदेश में लगभग 1.50 से ज्यादा शिक्षामित्र तैनात हुए थे। इनको 35-40 हजार रुपये वेतन दिया जाने लगा था। सपा सरकार के आखिरी समय में कुछ शिक्षामित्रों का समायोजन रह गया था। वहीं पहले हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट से टीईटी पास न होने के कारण 2017 में उनका समायोजन निरस्त कर दिया गया था। तबसे वे 10 हजार रुपये मानदेय पर काम कर रहे थे। इसके बाद से वे लंबे समय से मानदेय बढ़ाने की मांग और इसके लिए आंदोलन कर रहे थे।

विभिन्न स्तर पर वार्ता होने के बाद अब उनका नौ साल का वनवास प्रदेश सरकार ने खत्म करते हुए मानदेय बढ़ाकर लगभग दोगुना करने की घोषणा की है, जो एक अप्रैल से लागू होगा। वहीं हाल ही में प्रदेश सरकार ने शिक्षकों के साथ शिक्षामित्रों व अनुदेशकों को भी पांच लाख रुपये तक की कैशलेस चिकित्सा सुविधा में भी शामिल किया गया है।
 

शिक्षामित्र संघ ने जताया आभार

सीएम द्वारा सदन में शिक्षामित्रों के मानदेय बढ़ाने की घोषणा के साथ ही प्रदेश भर के शिक्षामित्रों व उनके परिवार में खुशी का माहौल हो गया। उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षामित्र संघ के प्रदेश अध्यक्ष शिव कुमार शुक्ला, महामंत्री सुशील यादव व संगठन मंत्री कौशल कुमार सिंह ने इसका स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इस निर्णय से प्रदेश के 1.43 लाख शिक्षामित्र परिवारों के जीवन स्तर में सुधार आएगा। वे और अधिक मनोयोग से शिक्षण कार्य करेंगे।
 

अनुदेशक भी कई साल से कर रहे थे इंतजार

प्रदेश में जूनियर हाईस्कूल में कला, विज्ञान, कंप्यूटर साइंस, खेलकूद आदि विषयों में पढ़ाई व प्रशिक्षण देने के लिए 2013-14 में तत्कालीन सपा सरकार ने लगभग 25 हजार अनुदेशकों की तैनाती की थी। इन्हें 7000 रुपये मानदेय पर रखा गया था। 

इसके बाद 2017 में इनका मानदेय 1400 रुपये बढ़ाया गया। हालांकि बाद में इसे वापस 7000 रुपये कर दिया गया था। भाजपा सरकार ने नवंबर 2021 में इनका मानदेय दो हजार बढ़ाते हुए 9000 रुपये किया। वहीं अब 9000 से बढ़ाकर 17000 रुपये करने की घोषणा की गई है।

शिक्षामित्र कब क्या हुआ

  • 26 मई 1999 को शिक्षामित्र योजना लागू हुई। 1450 रुपये मानदेय।
  • 2000-2001 में इनका मानदेय बढ़ाकर 2250 रुपये किया गया।
  • अक्तूबर 2005 में मानदेय 2250 रुपये से बढ़कर 2400 हुआ।
  • 15 जून 2007 को मानदेय 2400 रुपये से बढ़कर 3000 हुआ।
  • 11 जुलाई 2011 को शिक्षामित्रों के दो वर्षीय प्रशिक्षण का आदेश।
  • 23 जुलाई 2012 को कैबिनेट ने समायोजन का निर्णय लिया।
  • 19 जून 2014 को पहले बैच में 60442 शिक्षामित्रों के समायोजन प्रक्रिया
  • 08 अप्रैल 2015 को 77075 शिक्षामित्रों के समायोजन की प्रक्रिया
  • समायोजन के बाद शिक्षामित्रों का वेतन 35-40 हजार रुपये हुआ।
  • 12 सितंबर 2015 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समायोजन निरस्त किया।
  • 07 दिसंबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई।
  • 25 जुलाई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने समायोजन को निरस्त किया।
  • 01 अगस्त 2017 में मानदेय 3500 से बढ़कर 10 हजार रुपये हुआ।

(शिक्षामित्रों से मिली जानकारी के अनुसार।)

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