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मेडिकल के स्टूडेंट्स को करना पड़ेगा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतजार

ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ Updated Mon, 23 May 2016 03:02 PM IST
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मेडिकल की पीजी (एमडी व एमएस) में दाखिले के लिए अब प्रदेश सरकार को सुप्रीम कोर्ट के रुख का इंतजार है। सरकार ने पुनर्विचार याचिका दाखिल कर अपना पक्ष रखा है। 

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वहीं, एमबीबीएस कर चुके डॉक्टरों ने भी सुप्रीम कोर्ट से अपने फैसले पर फिर विचार करने की अपील की है। इस मामले की सुनवाई 26 मई को होगी।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की है जिसके तहत पीएमएस डॉक्टरों को वेटेज की नई गाइडलाइन दी गई है। यदि इस गाइडलाइन के हिसाब से वेटेज देकर मेरिट लिस्ट बनाई गई तो फ्रेशर्स के लिए पीजी कक्षाओं में बहुत कम सीटें बचेंगी।
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इसी को लेकर पिछले दिनों चिकित्सा शिक्षा विभाग ने मुख्यमंत्री को सभी पहलुओं से अवगत कराया। इसमें यह बताया गया कि पीएमएस डॉक्टरों को वेटेज की जो नई व्यवस्था बनाई गई है उसके अनुसार फ्रेशर्स एमबीबीएस डॉक्टरों के लिए मात्र 11 सीट ही बचेंगी। 

स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ओपेन कंडीडेट जो इस समय टॉप पर है वह खिसककर 129 नंबर पर चला जाएगा। यदि कोर्ट के निर्णय के अनुसार नई मेरिट लिस्ट बनती है तो उसमें पीएमएस संवर्ग के डॉक्टर ही एमडी व एमएस की सीटों पर दाखिला ले सकेंगे। ओपेन मेरिट से फ्रेशर्स को बहुत कम सीटें मिलेंगी।

पीएमएस डॉक्टरों को सरकार अपने खर्चे पर एमडी व एमएस कराती है, लेकिन इन को 10 साल तक स्वास्थ्य विभाग में नौकरी करने का बांड भरना पड़ता है।

यूपीपीजीएमई में हो चुके है 300 अभ्यर्थियों के प्रवेश

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ऐसे में मेडिकल कॉलेजों में खुल रहे सुपर स्पेशियलिटी विभागों में शिक्षक कहां से मिलेंगे? खुद चिकित्सा शिक्षा विभाग को यह चिंता सताने लगी है।

उत्तर प्रदेश पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल एग्जामिनेशन (यूपीपीजीएमई) की पहली काउंसलिंग हो चुकी है। इसके तहत 300 अभ्यर्थियों के प्रवेश हो चुके हैं। 

इन्होंने अपने-अपने मेडिकल कॉलेज जॉइन करने के बाद काम भी शुरू कर दिया है। ऐसे में यदि नई मेरिट बनी तो इनके दाखिले निरस्त होंगे। नए सिरे से फिर दाखिले होंगे। यही कारण है कि इन अभ्यर्थियों ने भी सुप्रीम कोर्ट में अपील की है।

अभी तक पीएमएस संवर्ग के उन डॉक्टरों को सरकार क्लीनिकल के एमडी व एमएस के दाखिले में वरीयता देती है जिन्होंने ग्रामीण इलाकों में तीन साल की सेवा की हो।

ग्रामीण क्षेत्रों में पीएमएस सेवाओं को प्रोत्साहन देने के लिए प्रदेश सरकार ने 2014 में एक आदेश दिया था। इसके तहत क्लीनिकल के एमडी व एमएस के स्टेट कोटा की 30 फीसदी सीटें इनके लिए रिजर्व की गई हैं।

 इस कोटे पर आपत्ति जताते हुए कुछ लोग पहले हाईकोर्ट चले गए थे। हाईकोर्ट ने यह कोटा निरस्त कर दिया था। इसी के बाद पीएमएस डॉक्टर व स्वास्थ्य विभाग सुप्रीम कोर्ट गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में नए दिशा-निर्देश दिए हैं।

ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले डॉक्टरों को मिलेगा फायदा

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इसके तहत ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले पीएमएस डॉक्टरों को 10 से लेकर 30 प्रतिशत तक वेटेज देकर मेरिट बनाने के निर्देश दिए हैं। इसमें एक साल ग्रामीण इलाके में काम करने वाले पीएमएस डॉक्टर को 10 प्रतिशत, दो साल काम करने वालों को 20 प्रतिशत व तीन साल काम करने वालों को 30 प्रतिशत वेटेज दिया जाए।

यानी उन्हें जितने नंबर मिले हैं उसमें 10, 20 व 30 नंबर बढ़ाकर नई मेरिट बनाई जाए। इसी मेरिट से दाखिले लिए जाएं।
एमडी व एमएस के सभी दाखिले 30 मई तक पूरे करने हैं। यदि नई मेरिट बनानी पड़ी तो इसके लिए सॉफ्टवेयर में भी बदलाव करना पड़ेगा। 

ऐसे में करीब 550 सीटों में दाखिले के लिए चार दिन काउंसलिंग में भी लगेंगे। इसकी तैयारियों में भी समय लग जाएगा। यह सब तब होगा जब स्वास्थ्य विभाग की ओर से वेटेज के लिए अधिकृत पीएमएस डॉक्टरों की लिस्ट मिलेगी। 

ऐसे में यदि नई मेरिट से दाखिले लेने पड़े तो 30 मई तक दाखिले आसान नहीं हैं। चिकित्सा शिक्षा के प्रमुख सचिव अनूप चन्द्र पांडेय का कहना है यह बात सही है कि वेटेज देने से फ्रेशर्स के लिए बहुत कम सीटें बचेंगी। 

हम सुप्रीम कोर्ट में सभी पहलुओं पर अपना पक्ष रख रहे हैं। इसके लिए पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी गई है। इसकी सुनवाई 26 को होनी है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के जो भी दिशा-निर्देश होंगे हम उनका पालन करेंगे।

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