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'लखनऊ को स्मार्ट बनाएं, पर पुराने शहर को बचाएं'

ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 22 Nov 2015 02:18 AM IST
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Raveesh Kumar speaks in IIM Lucknow.
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लखनऊ का अमीनाबाद या कोई भी पुराना इलाका घूमकर वहां चल रही गतिविधियों को देखिए। हो सकती है खराब सड़कें मिलें, जाम हो, सफाई भी अच्छी न हो, लेकिन फिर भी लोगों का ‘हैप्पीनेस क्वाशिएंट’ गुड़गांव-बंगलूरू के पॉश बाजारों से अच्छा मिलेगा।

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सैकड़ों चाय और खोमचे वालों से लेकर पुरानी दुकानों तक, सभी हजारों नागरिकों को रोजगार दे रही हैं। काम छूट भी जाए तो यकीन मानिए निकम्मे होने का ताना भले सुनने को मिले, लेकिन चाय और खाना पूछने वाले भी कम नहीं होंगे।
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गुड़गांव में किसी की नौकरी छूट जाए तो ऐसी आत्मीयता नहीं, अकेलापन मिलता है। आज जब लखनऊ और देश के कई शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने की बात चल रही है वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने पुराने शहर और इसकी तहजीब को बचाए रखने को भी उतना ही जरूरी बताया। मौका था आईआईएम लखनऊ में आयोजित मैनफेस्ट वर्चस्व 2015 का जहां वे बतौर आईकॉन स्पीकर आए थे।

मैनेजमेंट स्टूडेंट्स से अपील
अपने व्याख्यान में रवीश कुमार ने मैनेजमेंट स्टूडेंट् से से अपील की कि वे अपने प्रबंधन कौशल का राजनीति और पत्रकारिता में आजमाएं। इसकेजरिये राजनीति के मौजूदा ढंग में सुधार लाने का प्रयास करें न कि फायदा उठाने का।

उन्होंने कहा कि अगर वे बदलाव लाने की सोच के साथ मैदान में उतरें तो देश और यहां की जनता के लिए बहुत बड़ा योगदान देंगे, और केवल अपनी पार्टी या नेता को जितवाने के लिए उसका चुनाव मैनेजमेंट संभालने जाएंगे तो अपनी भूमिका सीमित पाएंगे।

राजनीति में मैनेजमेंट शैली

Raveesh Kumar speaks in IIM Lucknow.

रवीश ने कहा कि राजनीति में हाल के चुनावों को मैनेजमेंट के जरिये लड़ा और जीता जा रहा है। बहुत संभव है कि आने वाले समय में केवल नाम के लिए पार्टियां रह जाएंगी और पीछे से मैनेजमेंट करने वाली कंपनियां चुनावों को लड़ेंगी।

उन्होंने कहा कि आम चुनावों में भाजपा, दिल्ली में केजरीवाल और अब बिहार में महागठबंधन की जीत में इन मैनेजमेंट कंपनियों को दिए गए प्रचार के ठेकों को जिस तरह श्रेय दिया जा रहा है, यह दिन दूर नहीं।

राजनीतिक विज्ञापनों की जगह कंपनियों के होर्डिंग नजर आएंगे जिनमें कुछ ऐसे दावे होंगे कि ‘दो बार बीजेपी का जितवाया है, तीन बार कांग्रेस को हरवाया है और इस बार में सपा के साथ हूं इसलिए मेरे मैनेजमेंट पर भरोसा करके सपा को ही वोट दीजिए।’

खतरनाक है चलन
रवीश ने इस चलन पर कहा कि ये अच्छा है या नहीं पता नहीं, लेकिन खतरनाक जरूर है। राजनीतिक दल जवाबदेही के बजाय लोकप्रियता केआधार पर वोट मांगेंगे। उनसे किसी गलत नीति या निर्णय के लिए सवाल किया जाएगा तो वे रणनीतिकारों द्वारा किए सर्वे दिखाकर कहेंगे कि उस निर्णय के बाद लोकप्रियता पर असर नहीं हुआ है या वो बढ़ी है, इसलिए सवाल करना बेमानी है।

कोई मांग, कोई जवाब चाहने पर यह सर्वे दिखाकर चुप करवाया जाने लगेगा। आप सत्ताधरी पार्टी से कहेंगे कि मेरे शहर की सड़कें खराब हैं तो जवाब में हालिया सर्वे दिखाया जाएगा जिसमें लोकप्रियता बढ़ती दर्शाई हुई होगी। यह मैनेजमेंट क्या लोकतंत्र को जीवंत बनाए रख सकेगा, इसका जवाब तलाशने की जरूरत है।

यूपी में अमेरिका से रणनीतिकार आकर चुनाव लड़वा रहे हैं, ऐसे में कल को कोई पार्टी भारतीय रणनीतिकार कंपनी को ठेका देकर यह भी मुद्दा बना है कि देखिए हमारे रणनीतिकार स्वदेशी हैं।  चुनाव जनता की उम्मीदों का होता है, न कि रणनीतिकारों के अहम का।

लोकतंत्र में ऊपर से चीजें नहीं थोप सकते

Raveesh Kumar speaks in IIM Lucknow.

हाल में बिहार के चुनावों के परिपेक्ष्य में रवीश ने कहा कि हाल में जिस तरह से विशेषज्ञ रणनीतिकारों को चुनावों में जितवाने का ठेका दिया जाने लगा है, उसका सबसे बड़ा प्रभाव मुद्दे तय करने की प्रक्रिया पर हुआ है।

लोकतंत्र में मुद्दे हमेशा जमीन से उठकर राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बनते हैं जो एक स्वस्थ राजनीति का संकेत है, लेकिन ठेके पर रखे जा रहे रणनीतिकार ऊपर से मुद्दा थोपने लगे हैं जो पूरे माहौल का कृत्रिम बना देता है। ये मुद्दे वास्तविक मुद्दे नहीं हैं, भले कितने भी अच्छे लगे।

गाली-लाठी खाने वाले कार्यकर्ताओं से दूर हो रहे नेता

लोकतंत्र में विभिन्न पार्टियों के कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। वह पार्टी के लिए गाली-लाठी खाता है, जेल जाता है। वह पार्टी के नाम को लोकप्रियता दिलाता है, उसे चर्चा में बनाए रखता है। क्षेत्रों में तो लोग उसी के जरिए पार्टी को पहचानते हैं।

यही कार्यकर्ता नेता से मिलकर सिर्फ उनकी तारीफ नहीं करते, उन्हें जमीनी हकीकतें भी बताते हैं, यह एक संबंध होते हैं। लेकिन अगर उन्हें रणनीतिकारों से मिलने और उनके प्रति जवाबदेह बनाया जा रहा है। नेताओं के मंच कार्यकर्ताओं से दूर किए जाने लगे हैं और बीच में बन रही खाली जगह को ठेके के रणनीतिकार भरने लगे हैं।

इन रणनीतिकारों के लिए किसी पार्टी को चुनाव जितवाना येन केन प्रकारेण किसी को साबुन बेचने जैसा है, उसके बाद वे निकल जाते हैं। जबकि कार्यकर्ता जनता और नेता दोनों से जुड़ा रहता है, जवाबदेही इसी नेटवर्क से आती है।

जब कार्यकर्ता राजनीति से खत्म हो जाएंगे, राजनीतिक दल दुकान बनकर रह जाएंगे। खुद मीडिया भी बहुत हर तक इन रणनीतिकारों का एक्सटेंशन साबित होने लगा है।

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