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El Nino: अल नीनो के प्रभावों को समझना बड़ी चुनौती, पूर्वानुमान सिर्फ आशंकाएं; विशेषज्ञों का चौंकाने वाला दावा
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: Devesh Tripathi
Updated Thu, 18 Jun 2026 05:35 AM IST
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वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते वैश्विक तापमान के बावजूद अल नीनो के भविष्य के स्वरूप और उसके प्रभावों को लेकर अभी कई महत्वपूर्ण अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। विशेषज्ञ अब तक यह स्पष्ट नहीं कर पाए हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण अल नीनो की घटनाएं अधिक बार होंगी, अधिक तीव्र होंगी या उनके प्रभावों का दायरा बदलेगा।
जलवायु परिवर्तन के दौर में अल नीनो बना पहेली
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
बढ़ते वैश्विक तापमान के बावजूद वैज्ञानिक अभी तक यह स्पष्ट नहीं कर सके कि अल नीनो जैसी महत्वपूर्ण जलवायु घटना भविष्य में किस तरह का व्यवहार करेगी। यह भी तय नहीं है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अल नीनो की घटनाएं अधिक बार होंगी या नहीं। उनकी तीव्रता बढ़ेगी या उनके प्रभावों का स्वरूप बदलेगा। हालांकि, दीर्घकाल में अल नीनो और ला नीना से जुड़ी वर्षा की अनिश्चितता और चरम मौसमी घटनाओं के बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
डाउन टू अर्थ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो पर वैश्विक तापन के प्रभावों को समझना इसलिए भी कठिन है क्योंकि इस प्रणाली पर प्राकृतिक जलवायु उतार-चढ़ाव का असर बहुत गहरा है। ऐसे में मानवजनित जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक परिवर्तनशीलता के प्रभावों को अलग-अलग पहचानना वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
संयुक्त राष्ट्र समर्थित जलवायु विज्ञान संस्था अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (आईपीसीसी) की छठी आकलन रिपोर्ट के अनुसार अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ईएनएसओ) समेत अिधकतर प्रमुख जलवायु प्रणालियों में अब तक ऐसे दीर्घकालिक रुझानों के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले हैं जिन्हें प्राकृतिक परिवर्तनशीलता से अलग करके पहचाना जा सके।
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रिपोर्ट के मुताबिक निकट भविष्य में ईएनएसओ और उससे जुड़े जलवायु प्रभावों पर प्राकृतिक परिवर्तनशीलता का दबदबा बना रहने की संभावना है। हालांकि, लंबी अवधि में ईएनएसओ से जुड़ी वर्षा परिवर्तनशीलता बढ़ने की आशंका है। इसका अर्थ यह है कि भविष्य में अल नीनो और ला नीना कई क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और सूखे जैसी चरम मौसम घटनाओं को अधिक प्रभावित कर सकते हैं।
भविष्यवाणी में इसलिए दिक्कत
वैज्ञानिक भविष्य में 1.5 या 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक ताप वृद्धि की स्थिति में अल नीनो के व्यवहार का अनुमान लगाने के लिए जलवायु मॉडलों पर निर्भर रहते हैं। लेकिन मौजूदा मॉडलों में समुद्री सतह के तापमान के वितरण और वायुमंडलीय परिसंचरण जैसी प्रक्रियाओं को पूरी सटीकता से दर्शाने में कठिनाई है। यही कारण है कि अलग-अलग मॉडल विभिन्न क्षेत्रों में अल नीनो से जुड़े प्रभावों के बारे में अलग-अलग परिणाम देते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य की अधिक विश्वसनीय भविष्यवाणियों के लिए जलवायु मॉडलों में सुधार और अतिरिक्त शोध की आवश्यकता है।
कई अहम सवालों के जवाब अभी बाकी
वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी अनिश्चितता यह है कि क्या भविष्य में अल नीनो घटनाएं अधिक शक्तिशाली होंगी या उनकी संख्या बढ़ेगी। यह भी स्पष्ट नहीं है कि प्रशांत महासागर में इनके स्वरूप और विस्तार में किस तरह के बदलाव आएंगे तथा दुनिया भर में इनके प्रभाव किस हद तक बदलेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि इन सवालों के जवाब पाने के लिए लंबे समय तक एकत्रित उच्च गुणवत्ता वाले आंकड़ों, कम त्रुटियों वाले उन्नत मॉडलों, आंतरिक जलवायु परिवर्तनशीलता की बेहतर समझ और उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र तथा वायुमंडल के बीच होने वाली जटिल प्रक्रियाओं पर गहन शोध की आवश्यकता होगी। फिलहाल उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य यह बताते हैं कि अल नीनो और वैश्विक तापन के बीच संबंध मौजूद तो है, लेकिन उसका स्वरूप और भविष्य की दिशा अभी भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
डाउन टू अर्थ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो पर वैश्विक तापन के प्रभावों को समझना इसलिए भी कठिन है क्योंकि इस प्रणाली पर प्राकृतिक जलवायु उतार-चढ़ाव का असर बहुत गहरा है। ऐसे में मानवजनित जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक परिवर्तनशीलता के प्रभावों को अलग-अलग पहचानना वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
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संयुक्त राष्ट्र समर्थित जलवायु विज्ञान संस्था अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (आईपीसीसी) की छठी आकलन रिपोर्ट के अनुसार अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ईएनएसओ) समेत अिधकतर प्रमुख जलवायु प्रणालियों में अब तक ऐसे दीर्घकालिक रुझानों के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले हैं जिन्हें प्राकृतिक परिवर्तनशीलता से अलग करके पहचाना जा सके।
रिपोर्ट के मुताबिक निकट भविष्य में ईएनएसओ और उससे जुड़े जलवायु प्रभावों पर प्राकृतिक परिवर्तनशीलता का दबदबा बना रहने की संभावना है। हालांकि, लंबी अवधि में ईएनएसओ से जुड़ी वर्षा परिवर्तनशीलता बढ़ने की आशंका है। इसका अर्थ यह है कि भविष्य में अल नीनो और ला नीना कई क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और सूखे जैसी चरम मौसम घटनाओं को अधिक प्रभावित कर सकते हैं।
भविष्यवाणी में इसलिए दिक्कत
वैज्ञानिक भविष्य में 1.5 या 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक ताप वृद्धि की स्थिति में अल नीनो के व्यवहार का अनुमान लगाने के लिए जलवायु मॉडलों पर निर्भर रहते हैं। लेकिन मौजूदा मॉडलों में समुद्री सतह के तापमान के वितरण और वायुमंडलीय परिसंचरण जैसी प्रक्रियाओं को पूरी सटीकता से दर्शाने में कठिनाई है। यही कारण है कि अलग-अलग मॉडल विभिन्न क्षेत्रों में अल नीनो से जुड़े प्रभावों के बारे में अलग-अलग परिणाम देते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य की अधिक विश्वसनीय भविष्यवाणियों के लिए जलवायु मॉडलों में सुधार और अतिरिक्त शोध की आवश्यकता है।
कई अहम सवालों के जवाब अभी बाकी
वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी अनिश्चितता यह है कि क्या भविष्य में अल नीनो घटनाएं अधिक शक्तिशाली होंगी या उनकी संख्या बढ़ेगी। यह भी स्पष्ट नहीं है कि प्रशांत महासागर में इनके स्वरूप और विस्तार में किस तरह के बदलाव आएंगे तथा दुनिया भर में इनके प्रभाव किस हद तक बदलेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि इन सवालों के जवाब पाने के लिए लंबे समय तक एकत्रित उच्च गुणवत्ता वाले आंकड़ों, कम त्रुटियों वाले उन्नत मॉडलों, आंतरिक जलवायु परिवर्तनशीलता की बेहतर समझ और उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र तथा वायुमंडल के बीच होने वाली जटिल प्रक्रियाओं पर गहन शोध की आवश्यकता होगी। फिलहाल उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य यह बताते हैं कि अल नीनो और वैश्विक तापन के बीच संबंध मौजूद तो है, लेकिन उसका स्वरूप और भविष्य की दिशा अभी भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।