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मुद्दा शिक्षकों को जिम्मेदार बनाने का भी है

मुकुल श्रीवास्तव Updated Thu, 28 Aug 2014 07:33 PM IST
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The point is to make teachers responsible
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निःशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है। इसी को ध्यान में रखते हुए विश्व के सभी शीर्ष नेताओं ने इसे सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों का हिस्सा बनाया और वर्ष 2015 तक हर बच्चे को प्राइमरी शिक्षा मुहैया कराने का निर्णय लिया। भारत के लिए आज की तारीख में इस लक्ष्य की प्राप्ति सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद असंभव दिखती है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश के एक विद्यालय की एक अध्यापिका पिछले तेईस वर्षों से अनुपस्थित चल रही हैं। हालांकि यह अपवाद घटना हो सकती है, पर कक्षाओं से शिक्षकों की अनुपस्थिति हमारे यहां एक चिरकालिक समस्या है। वैसे तो कक्षाओं से शिक्षकों की अनुपस्थिति के कई कारण हैं, जिनमें से कुछ वास्तविक भी हैं, परंतु इसका सबसे बड़ा कारण है शिक्षकों का सरकारी वेतन  लेते हुए भी दूसरे कार्यों जैसे निजी कोचिंग चलाने में व्यस्त रहना।

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शिक्षकों की अनुपस्थिति का एक और प्रमुख कारण है उनको अन्य सरकारी कार्यों, जैसे चुनावों में लगा देना। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, विकासशील देशों में अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों की संख्या 11 से 30 प्रतिशत के बीच में है। एक शोध के मुताबिक, शिक्षकों की अनुपस्थिति से भारत को सालाना लगभग 1.5 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ता है। भारत सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान पर बहुत खर्च किया है। यह खर्च जुटाने के लिए अतिरिक्त कर भी लगाया गया। पर इस अभियान का मूल उद्देश्य, जो शिक्षा के आधारभूत ढांचे और उसकी गुणवत्ता को बेहतर बनाना था, पूर्ण नहीं हो पाया है।
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शिक्षा पर होने वाले खर्च का एक बड़ा हिस्सा शिक्षकों के वेतन पर खर्च होता है। ऐसे में, बड़े पैमाने पर शिक्षकों की अनुपस्थिति का सीधा मतलब है, बहुमूल्य सार्वजनिक धन का दुरुपयोग। विश्व बैंक के एक शोध के अनुसार, भारत के सरकारी स्कूलों के औचक निरीक्षण के दौरान लगभग 25 प्रतिशत शिक्षक अनुपस्थित पाए गए, और जो उपस्थित थे, उनमें से भी केवल आधे ही कक्षाओं में पढ़ाते मिले। शिक्षकों की अनुपस्थिति का आंकड़ा महाराष्ट्र में लगभग 15 प्रतिशत था, जबकि झारखंड में 42 फीसदी। इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि वेतन की कमी या अधिकता का शिक्षकों की अनुपस्थिति से कोई संबंध नहीं है। निजी स्कूलों में अनुपस्थिति की समस्या न के बराबर है।

वर्ष 2010 में एमआइटी द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों पर जब कैमरों से निगाह रखी गई और उनके वेतन को उनके काम करने के वास्तविक दिनों से जोड़ दिया गया, तो अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों की संख्या में लगभग 21 प्रतिशत की कमी आई। जाहिर है, सरकारी स्कूलों का बढ़िया वेतन और स्थायी नौकरी की गारंटी भी शिक्षकों के इस आचरण के लिए जिम्मेदार है। अगर उनके अध्यापन कौशल को छात्रों की प्रगति से जोड़ दिया जाए और कक्षाओं में उनकी मौजूदगी के आधार पर ही वेतन तय हो, तो उनकी गैरमौजूदगी कम होगी। इसके अलावा निरीक्षण के बेहतर तरीकों और कठोर अनुशासन के जरिये भी इस समस्या से निपटा जा सकता है। हालांकि इन सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षकों को उनकी जिम्मेदारी और उनके कार्य की महत्ता का एहसास दिलाया जाए।

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