मुजफ्फरनगर दंगे के पीछे उजागर हुई सियासत ने राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी है। पुलिस का ‘सच’ सामने आने के बाद हुकूमत निशाने पर है। विरोधी दल किसी भी कीमत पर सपा को बख्शने के मूड में नहीं हैं। अब पीड़ितों के जख्मों से ज्यादा सियासत की फिक्र है।
मुजफ्फरनगर के दंगे दुनियाभर की सुर्खियां बन गए हैं। छेड़छाड़ को लेकर मुल्क में इतना बड़ा दंगा कभी नहीं देखा गया। दंगे का खतरनाक पहलू यह है कि नफरत का जहर गांव-गांव तक फैल गया। प्रशासन के आंकड़ों के मुताबिक हिंसा ने वेस्ट के सौ गांवों के सौहार्द को झुलसा दिया।
उन्माद की जड़ें कैसे सियासत से जुड़ी हैं, इसका खुलासा टीवी स्टिंग में हुआ, तो दिल्ली से लखनऊ तक राजनीतिक गलियारों में खलबली मची है। नौकरशाह साफ बोल गए कि सरकार के एक ‘पावरफुल’ मंत्री के आगे सिस्टम बेबस हो गया था।
दंगे में 50 मौतों के बाद अखिलेश सरकार जागी, तब तक मटियामेट हो चुका था।
सीएम और पीएम को आनन-फानन में दंगा पीड़ितों के बीच आना पड़ा। लोकसभा चुनाव से पहले वेस्ट के कई जिलों में फैली सांप्रदायिकता की चिंगारी ने राजनीतिक समीकरण बिगाड़ दिए हैं।
हालात ऐसे हो गए हैं कि कई उम्मीदवार अपने टिकट वापस करने को तैयार हैं। बागपत के सपा प्रत्याशी सोमपाल शास्त्री बदले माहौल को भांपकर कदम पीछे खींच चुके हैं। चुनाव तक प्रत्याशियों में बड़ा उलटफेर होगा।
विरोधी पार्टियां चाहे भाजपा हो या फिर बसपा। दंगे के जाल में फंसी सपा को कोई भी दल बख्शने के मूड में नहीं हैं। पूरी कवायद इसी बात पर है कि मुसलिम मतदाताओं की निगाह में सपा को कैसे दंगे का मुजरिम साबित किया जाए।
सरकार के नाते पीएम और सीएम ने दंगा पीड़ितों को राहत जरूर दी, लेकिन सारा खेल अब सियासी हो गया है।
अभी तक बेघर लोगों की घर वापसी तय नहीं हुई है। जमींदोज घरों में लोग कैसे रहेंगे? उजड़े रोजगार कैसे जमेंगे और दूसरे संप्रदाय से भाईचारा कैसे बन पाएगा। यह गहरे जख्म ही हजारों दंगा पीड़ितों के लिए नासूर बन गए हैं।
क्या होना चाहिए:
* दंगे में मारे गए बेगुनाहों के परिजनों को जल्द से जल्द मुआवजा मिले।
* हिंसाग्रस्त गांवों में पुलिस-प्रशासन की सुरक्षा में उजड़े लोगों को बसाया जाए।
* उन्माद के आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, ताकि पीड़ितों का डर दूर हो।
* ग्राम पंचायतों में दोनों समुदाय की संयुक्त सुरक्षा समितियां गठित की जाएं।
* आगे से हिंसा न हो, इसके लिए ग्राम प्रधानों की भी जिम्मेदारी तय की जाए।
* छेड़छाड़ की घटनाओं को पुलिस अधिकारी गंभीरता से लें, आरोपियों पर अंकुश लगे।
* गांवों में दोनों समुदायों के भूमि से जुड़े विवादों का निपटारा त्वरित किया जाए।