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यूपी में भाजपा के लिए बंजर हैं ये सीटें, मोदी लहर भी यहां रही बेअसर

ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 12 Feb 2017 07:08 AM IST
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यूपी विधानसभा की कई सीटें भाजपा के लिए लंबे वक्त से बंजर बनी हुई हैं। राम लहर हो या मोदी लहर, इनमें कई सीटों पर भाजपा का कमल खिल नहीं पाया। कभी खिला भी तो सिलसिला बरकरार नहीं रह पाया।
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पर, वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में यह मिथक टूटा और भाजपा प्रदेश विधानसभा की तीन चौथाई से ज्यादा 337 सीटों पर बढ़त बनाने में कामयाब रही। पर, 66 सीटों पर भाजपा फिर भी अपना परचम फहरा नहीं पाई। इन 66 सीटों में 51 पर पहले तीन चरण के दौरान ही फैसला हो जाना है।

चुनौती अपनी ही कसौटी की
भाजपा के सामने लोकसभा चुनाव में मिली बढ़त को न सिर्फ बरकरार रखने की चुनौती है, बल्कि बंजर बनी सीटों में भी कुछ पर कमल खिलाकर यह साबित करने की भी जिम्मेदारी है कि लोकसभा चुनाव में उन्हें इतनी सीटें मिलना अकारण नहीं था।
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लोगों ने भाजपा को वास्तव में सपा, बसपा और कांग्रेस के कामकाज व रीति-नीति से आजिज आकर समर्थन व वोट दिया था। पर, आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो इस चुनौती से पार पाना भाजपा के लिए असंभव भले ही न हो, लेकिन बहुत आसान भी नहीं है।

इन सीटों पर रही है भाजपा की कठिन परीक्षा

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा जिन सीटों पर नंबर एक नहीं आ पाई है, उनमें कुछ समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के परिवार के सदस्यों के प्रभाव वाले क्षेत्रों फीरोजाबाद, मैनपुरी, कन्नौज, बदायूं, आजमगढ़ और कांग्रेस नेता सोनिया गांधी व राहुल गांधी के इलाके रायबरेली व अमेठी में स्थित हैं। कई सीटें ऐसी भी हैं जहां सीधे तौर पर मुलायम या नेहरू परिवार का कोई सदस्य नहीं जुड़ा है।

इनमें सहारनपुर की बेहट, मुरादाबाद ग्रामीण, रामपुर की सदर, स्वार, चमरुआ, संभल की संभल सदर,  कुंदरकी, असमोली, अमरोहा की अमरोहा सदर, आगरा की बाह, खीरी की गोला गोकरननाथ, सीतापुर की लहरपुर, बिसवां, मिश्रिख, सिधौली, प्रतापगढ़ की रामपुर खास, बाबागंज व कुंडा, फर्रुखाबाद की अलीगंज, झांसी की मऊरानीपुर,  हरदोई सदर, हरदोई की ही गोपामऊ, सांडी व बालामऊ, इलाहाबाद की मेजा व करछना, डुमरियागंज की इटवा, बस्ती की महादेवा, संतकबीरनगर की धनघटा व कुशीनगर की पड़रौना सीटें शामिल हैं।

खास बात यह है कि इन सीटों पर 2012 के विधानसभा और 2009 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा प्रभावी प्रदर्शन नहीं कर पाई थी। इसलिए देखने वाली बात होगी कि भाजपा इन सीटों पर कैसा मुकाबला करती है।

ये 80 सीटें भाजपा के लिए दो दशकों से बनी चुनौती

प्रदेश में विधानसभा की लगभग 80 सीटें भाजपा की जीत के लिए लगभग दो दशकों से चुनौती बनी हुई हैं। इनमें कई जगह तो विधानसभा के पिछले छह चुनाव से भाजपा के लिए विजय पताका फहराना चुनौती रहा है।

इन सीटों पर अगर क्षेत्रवार नजर दौड़ाएं तो अवध में 21, कानपुर में 12, गोरखपुर में 12, काशी में 17, पश्चिम में सात और बृज में 12 सीटें ऐसी हैं जिन पर दो दशकों से भाजपा का कमल खिल नहीं पाया है।

इनमें रामपुर, मुरादनगर, शिवालखास, बागपत, छपरौली, नकुड़, गुन्नौर, जसराना, जलालाबाद, मोहनलालंगज, मलिहाबाद, सरोजनीनगर, सिधौली, नवाबगंज (बाराबंकी), जसवंतनगर, कुंडा, भरथना, विधूना, भोगनीपुर, निजामाबाद, मऊ, करछना,  व रामपुर खास सहित लगभग तीन दर्जन सीटें ऐसी हैं जिन पर दो दशक से पहले भी भाजपा का कमल खिल नहीं सका है।

दलबदलुओं को मौका देकर जीतने की कोशिश

भाजपा के रणनीतिकार भी शायद इन सीटों की दुश्वारियों को अच्छी प्रकार जानते व समझते हैं। इसीलिए उन्होंने लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव के आंकड़ों के आधार पर कई स्थानों पर दूसरे दलों के लोगों को शामिल करके मैदान में उतारा है।

जिसका उदाहरण बसपा से स्वामी प्रसाद मौर्य की पड़रौना, महावीर राणा की बेहट, धर्म सिंह सैनी की नकुड़, योगेश धामा की बागपत, बाह से रानी पक्षालिका सिंह, गंगोह से प्रदीप चौधरी व मुरादनगर से अजीत पाल त्यागी जैसे चेहरों को मैदान में उतारना है।

इससे यह साफ पता चलता है कि रणनीतिकारों ने इन सीटों के स्थानीय समीकरण और इन सीटों के इलाके में प्रभावी चेहरों को शामिल करके पार्टी की जीत के दरवाजे खोलने की कोशिश की है।
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