घटिया क्वालिटी की दवाओं को बाजार में आने से रोकने के लिए उत्तराखंड सरकार संजीदा नहीं है।
410 नमूनों में 30 फेल हुए
ड्रग लाइसेंसिंग एंड कंट्रोलिंग अथारिटी का संचालन राज्य गठन के बाद से कार्यवाहक ड्रग कंट्रोलर के जिम्मे है और स्टाफ भी एक चौथाई ही है। खाद्य विश्लेषक प्रयोगशाला में बीते वर्ष प्राधिकरण की ओर से भेजे गए 410 नमूनों में 30 फेल हुए।
इस दौरान केवल पचास फीसदी मामलों में आरोपी दवा कंपनियों पर शिकंजा कसा गया। राज्य में ड्रग लाइसेंसिंग एंड कंट्रोलिंग अथारिटी मानव संसाधन की कमी से जूझ रही है।
प्राधिकरण ने बीते चार वर्षों में 35 दवा कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की है। प्राधिकरण को छापे सहित सैंपलिंग के लिए 46 ड्रग इंस्पेक्टरों की जरूरत है लेकिन तैनाती केवल 12 की है।
फील्ड स्टाफ की भारी कमी से जूझ रहे प्राधिकरण के 13 जनपदों में 12 ड्रग इंस्पेक्टर तैनात हैं। इनमें तीन वरिष्ठ ड्रग इंस्पेक्टर हैं, जिसमें एक को ड्रग कंट्रोलर का जिम्मा दिया गया है।
वर्षों से शासन में धूल फांक रहा प्रस्ताव
उधर संवर्ग का ढांचा बनाने का प्रस्ताव वर्षों से शासन में धूल फांक रहा है। ढांचे में एक ड्रग कंट्रोलर, 3 डिप्टी ड्रग कंट्रोलर, 6 सहायक ड्रग कंट्रोलर और 46 ड्रग इंस्पेक्टरों का प्रावधान है।
सरकार जब तक प्रस्तावित ढांचे पर मुहर नहीं लगाती अस्पतालों में घटिया या एक्सपायरी दवाओं की सप्लाई की आशंका बनी रहेगी।
गाइडलाइन मानें तो कैसे
ड्रग एंड कास्मेटिक एक्ट 2008 में सैंपल फेल होने पर कार्रवाई के लिए केंद्र की गाइडलाइन का उत्तराखंड में अमल हो पाना संभव नहीं है। फेल होने वाले सैंपल की जांच के लिए ड्रग कंट्रोलर के निर्देश पर इंस्पेक्टर को जांच कर रिपोर्ट देनी होती है।
इसके साथ तीन सहायक ड्रग कंट्रोलर की कमेटी इंस्पेक्टर की जांच पर अपनी रिपोर्ट देती है, लेकिन राज्य में एक भी एडीसी का पद नहीं है।