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UNEP Report: कंक्रीट के जंगल बना रहा इंसान, बढ़ती इमारतें धरती को धकेल रहीं गर्मी और प्रदूषण के संकट में

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Wed, 27 May 2026 07:20 AM IST
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सार
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संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में हर हफ्ते एक नया पेरिस जितना निर्माण हो रहा है। तेजी से बढ़ती इमारतें और कंक्रीट के जंगल जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और ऊर्जा संकट को बढ़ा रहे हैं। निर्माण क्षेत्र वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का 37 फीसदी हिस्सा बन चुका है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर टिकाऊ और हरित निर्माण मॉडल नहीं अपनाया गया, तो भारत जैसे देशों के बड़े शहर भविष्य में रहने लायक नहीं रहेंगे।

UNEP Report  on Humans Are Creating Concrete Jungles Pushing Earth in Crisis Heat Pollution
इमारतों ने बढ़ाया प्रदूषण और गर्मी का खतरा - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

दुनिया तेजी से आधुनिक शहर और ऊंची इमारतें बना रही है, लेकिन इसी विकास की रफ्तार ने पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा खड़ा कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में हर हफ्ते लगभग एक नया पेरिस खड़ा हो रहा है। हर दिन करीब 1.27 करोड़ वर्ग मीटर नए निर्माण हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ते कंक्रीट के जंगल अब जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गर्मी, प्रदूषण और ऊर्जा संकट को और गंभीर बना रहे हैं। भारत जैसे तेजी से विकसित हो रहे देशों के बड़े शहर अब गर्म भट्ठियों में बदलते जा रहे हैं।



आखिर निर्माण क्षेत्र को इतना बड़ा खतरा क्यों माना जा रहा है?
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और ग्लोबल एलायंस फॉर बिल्डिंग्स एंड कंस्ट्रक्शन की रिपोर्ट के मुताबिक, निर्माण क्षेत्र अब दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन का 37 फीसदी हिस्सा बन चुका है। वहीं वैश्विक ऊर्जा खपत में इसकी हिस्सेदारी 28 फीसदी है। यानी जितनी तेजी से इमारतें बढ़ रही हैं, उतनी ही तेजी से ऊर्जा की खपत और प्रदूषण भी बढ़ रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पेड़ों की कटाई, कंक्रीट का विस्तार और तेजी से हो रहा शहरीकरण शहरों के तापमान को लगातार बढ़ा रहा है।
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भारत जैसे देशों पर सबसे ज्यादा असर क्यों?
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में तेजी से बुनियादी ढांचा विकसित हो रहा है। नए शहर, हाईवे, मॉल, दफ्तर और बड़ी इमारतें लगातार बन रही हैं। इसी कारण पर्यावरण पर दबाव भी तेजी से बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि शहरों में हरियाली कम होने और कंक्रीट बढ़ने से “हीट आइलैंड इफेक्ट” पैदा हो रहा है। इससे शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों से ज्यादा हो जाता है। यही वजह है कि दिल्ली, मुंबई, बंगलूरू और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में गर्मी लगातार बढ़ रही है।
 
2050 तक दुनिया के सामने कैसी चुनौती होगी?
यूएनईपी की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने कहा कि 2050 तक दुनिया की आधी इमारतों का निर्माण या पुनर्निर्माण अभी बाकी है। यानी आने वाले वर्षों में निर्माण गतिविधियां और तेजी से बढ़ेंगी। उन्होंने कहा कि सरकारों के पास अभी मौका है कि वे नई इमारतों को पर्यावरण के अनुकूल बनाएं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि स्वच्छ और ऊर्जा दक्ष निर्माण तकनीकों के लिए 2030 तक करीब 5.9 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की जरूरत होगी। अगर अभी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में हालात और गंभीर हो सकते हैं।

क्या सिर्फ निर्माण रोकना ही समाधान है?
विशेषज्ञों का कहना है कि शहरों का विस्तार पूरी तरह रोकना संभव नहीं है। असली चुनौती यह है कि विकास को टिकाऊ कैसे बनाया जाए। ऊर्जा बचाने वाली इमारतें, ज्यादा हरित क्षेत्र, वर्षा जल संरक्षण और अक्षय ऊर्जा आधारित ढांचे पर जोर देना होगा। अगर निर्माण कार्य पुराने तरीके से ही चलता रहा, तो शहरों में गर्मी, जल संकट और प्रदूषण का स्तर खतरनाक रूप ले सकता है।

भविष्य के शहर कैसे बचाए जा सकते हैं?
वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में ग्रीन सिटी मॉडल सबसे जरूरी होगा। शहरों में पेड़ बढ़ाने, प्राकृतिक जल स्रोत बचाने और पर्यावरण अनुकूल निर्माण सामग्री के इस्तेमाल पर जोर देना होगा। साथ ही सरकारों को ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जिससे विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहे। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर इंसान ने अभी अपनी निर्माण नीति नहीं बदली, तो भविष्य में बड़े शहरों में रहना और मुश्किल हो सकता है।

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