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खामनेई की हत्या के बाद प्रतिरोध की धुरी बिखरी: लेबनान, यमन व इराक में ईरान समर्थित गुटों के अस्तित्व पर संकट

अमर उजाला नेटवर्क Published by: Shubham Kumar Updated Tue, 03 Mar 2026 07:35 AM IST
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सार

अमेरिका और इस्राइल के हमले में अयातुल्ला खामेनेई की हत्या ने पश्चिम एशिया में प्रतिरोध की धुरी को हिला दिया। आईआरजीसी और जमीनी मार्ग टूटने से सहयोगी गुट अब वैचारिक निष्ठा और स्थानीय अस्तित्व के बीच संतुलन साधने में उलझे हैं। रणनीतिक प्रतिक्रिया में असमंजस साफ दिख रहा है।

Khamenei assassination resistance Iran-backed groups in Lebanon, Yemen, and Iraq face existential crisis
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला/AI
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विस्तार

अमेरिका और इस्राइल के हवाई अभियान में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या ने पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक संरचना को झकझोर दिया है। दशकों से ईरान द्वारा खड़ा किया गया एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस (प्रतिरोध की धुरी) जो लेबनान, यमन और इराक में सक्रिय सहयोगी गुटों पर आधारित था अब नेतृत्वहीन और असमंजस की स्थिति में दिखाई दे रहा है। तेहरान ने चेतावनी दी है कि वह सब कुछ जला देगा और अमेरिका तथा इस्राइल को अभूतपूर्व जवाब देगा, लेकिन जमीनी स्तर पर उसके सहयोगी गुटों की प्रतिक्रिया से संकेत मिलता है कि वैचारिक निष्ठा और स्थानीय अस्तित्व के बीच संतुलन साधना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
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अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक खामेनेई की मौत से ईरान की उस व्यवस्था को बड़ा झटका लगा है जिसके सहारे वह अपने सहयोगी गुटों को संभालता था। यह व्यवस्था तीन चीजों पर टिकी थी। पहली, सर्वोच्च नेता की वैचारिक पकड़। दूसरी, आईआरजीसी यानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स का सैन्य समन्वय। तीसरी, सीरिया के रास्ते लेबनान तक बना जमीनी संपर्क।सीरिया में 2024 के अंत में बशर अल-असद की सरकार गिरने के बाद यह जमीनी रास्ता पहले ही टूट चुका था।
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आईआरजीसी नेतृत्व का खालीपन
इससे लेबनान के हिज्बुल्लाह तक हथियार और अन्य मदद पहुंचाना मुश्किल हो गया था। अब खामेनेई और आईआरजीसी के कई बड़े कमांडरों की मौत के बाद नेतृत्व का खालीपन और बढ़ गया है। तेहरान विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हसन अहमदियन ने कहा है कि अब ईरान रणनीतिक धैर्य की नीति छोड़ सकता है और कड़ा जवाब दे सकता है। लेकिन जमीनी हालात बताते हैं कि उसके सहयोगी गुट उतनी जल्दी और खुलकर कदम उठाने की स्थिति में नहीं हैं।

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लेबनान- हिजबुल्ला सावधानी से कदम रख रहा
लेबनान में हिजबुल्ला को ईरान का सबसे मजबूत सहयोगी माना जाता है। खामेनेई की मौत के बाद उसने हमले की कड़ी निंदा की, लेकिन सीधे तौर पर इस्राइल पर हमला करने या बदला लेने की घोषणा नहीं की। हिजबुल्ला का बयान ज्यादा रक्षात्मक था। उसमें कहा गया कि वह आक्रामकता का सामना करेगा, लेकिन हमला करने की सीधी धमकी नहीं दी गई। हिजबुल्ला इस समय कमजोर स्थिति में है। सीरिया का रास्ता बंद होने से उसकी सप्लाई प्रभावित हुई है। लेबनान खुद आर्थिक और राजनीतिक संकट से गुजर रहा है। ऐसे में हिजबुल्ला खुला युद्ध शुरू करने से बचता दिख रहा है।

यमन: हूती दो मोर्चों पर फंसे
यमन में हूती विद्रोहियों की स्थिति भी आसान नहीं है। उनके नेता अब्देल-मलिक अल-हूती ने कहा है कि वे हर स्थिति के लिए तैयार हैं। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि ईरान मजबूत है और वही जवाब देगा। इससे संकेत मिलता है कि हूती फिलहाल सीधा टकराव नहीं चाहते। हूती पहले ही लाल सागर में जहाजों को निशाना बना चुके हैं और इस्राइल की ओर मिसाइलें दाग चुके हैं। लेकिन अब यमन के भीतर उनकी स्थिति चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त यमनी सरकार दोबारा सना पर कब्जा करने की तैयारी में है। रक्षा मंत्री ताहेर अल-अकीली ने कहा है कि अभियान राजधानी की ओर बढ़ रहा है। अगर हूती इस समय ईरान के लिए बड़े युद्ध में कूदते हैं तो उनका घरेलू मोर्चा कमजोर पड़ सकता है। इसलिए वे बयानबाजी तो कर रहे हैं, लेकिन बड़ा कदम उठाने से बच रहे हैं।

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इराक: हालात सबसे ज्यादा संवेदनशील
इराक में कई ईरान समर्थित मिलिशिया सरकारी ढांचे का हिस्सा भी हैं। इन्हें पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज यानी पीएमएफ कहा जाता है। अगर ये समूह अमेरिका पर हमला करते हैं तो मामला केवल मिलिशिया और अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इराकी सरकार भी सीधे टकराव में आ सकती है।2024 में इराकी प्रधानमंत्री के सलाहकार इब्राहिम अल-सुमैदाई ने कहा था कि अमेरिका इन मिलिशिया को खत्म करने की धमकी दे चुका है। इस बयान के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। अब खामेनेई की मौत के बाद यह खतरा और बढ़ गया है।

अपनी डफली-अपना राग
खामेनेई की हत्या के बाद स्थिति साफ है कि एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस पहले जैसा मजबूत और संगठित नहीं रहा। हर देश में मौजूद ईरान समर्थित गुट अपनी-अपनी स्थानीय परेशानियों में उलझे हैं।लेबनान में हिज्बुल्लाह दबाव में है। यमन में हूती अपने कब्जे वाले इलाकों को बचाने में लगे हैं। इराक में मिलिशिया और सरकार के रिश्ते नाजुक हैं।

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