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Meerut News: गोवर्धन लीला सुन भाव-विभोर हुए श्रोता
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बहसूमा। तजपुरा गांव भागवत कथा सुनते श्रद्धालु
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संवाद न्यूज एजेंसी
बहसूमा। क्षेत्र के तजपुरा गांव में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में शुक्रवार को गोवर्धन पूजा एवं भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला का भावपूर्ण वर्णन किया गया। कथा वाचक कृष्ण भक्त अमित महाराज ने व्यास गद्दी से इंद्र का मान-मर्दन और गिरिराज धारण का प्रसंग सुनाया तो पूरा पंडाल गोवर्धन महाराज के जयकारों से गूंज उठा।
कथावाचक ने बताया कि गोकुलवासी हर साल इंद्र की पूजा करते थे। बाल कृष्ण ने नंदबाबा से कहा कि हमें उस गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए जो हमारी गायों को चारा-पानी देता है। कृष्ण के कहने पर सभी ने इंद्र की जगह गोवर्धन पूजा शुरू की। अपना अपमान समझकर देवराज इंद्र ने क्रोध में गोकुल पर मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। चारों ओर जल-प्रलय जैसे हालात बन गए। गोकुलवासी भयभीत होकर श्रीकृष्ण की शरण में पहुंचे। भक्तों की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी सबसे छोटी अंगुली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया। सभी गोकुलवासियों ने अपने गाय-बछड़ों समेत पर्वत के नीचे शरण ली। सात दिन-सात रात तक लगातार वर्षा होती रही, लेकिन भगवान की कृपा से सब सुरक्षित रहे। अंत में अपनी हार मानकर देवराज इंद्र श्रीकृष्ण के चरणों में आए और क्षमा मांगी।
कथा के दौरान गोवर्धन महाराज की भव्य झांकी सजाई गई। श्रद्धालुओं ने 56 भोग अर्पित कर गिरिराज की परिक्रमा की। महिलाएं मेरो गोवर्धन गिरधारी भजन पर झूम उठीं। प्रसंग सुनाते-सुनाते कथा वाचक भी भावुक हो गए।
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बहसूमा। क्षेत्र के तजपुरा गांव में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में शुक्रवार को गोवर्धन पूजा एवं भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला का भावपूर्ण वर्णन किया गया। कथा वाचक कृष्ण भक्त अमित महाराज ने व्यास गद्दी से इंद्र का मान-मर्दन और गिरिराज धारण का प्रसंग सुनाया तो पूरा पंडाल गोवर्धन महाराज के जयकारों से गूंज उठा।
कथावाचक ने बताया कि गोकुलवासी हर साल इंद्र की पूजा करते थे। बाल कृष्ण ने नंदबाबा से कहा कि हमें उस गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए जो हमारी गायों को चारा-पानी देता है। कृष्ण के कहने पर सभी ने इंद्र की जगह गोवर्धन पूजा शुरू की। अपना अपमान समझकर देवराज इंद्र ने क्रोध में गोकुल पर मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। चारों ओर जल-प्रलय जैसे हालात बन गए। गोकुलवासी भयभीत होकर श्रीकृष्ण की शरण में पहुंचे। भक्तों की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी सबसे छोटी अंगुली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया। सभी गोकुलवासियों ने अपने गाय-बछड़ों समेत पर्वत के नीचे शरण ली। सात दिन-सात रात तक लगातार वर्षा होती रही, लेकिन भगवान की कृपा से सब सुरक्षित रहे। अंत में अपनी हार मानकर देवराज इंद्र श्रीकृष्ण के चरणों में आए और क्षमा मांगी।
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कथा के दौरान गोवर्धन महाराज की भव्य झांकी सजाई गई। श्रद्धालुओं ने 56 भोग अर्पित कर गिरिराज की परिक्रमा की। महिलाएं मेरो गोवर्धन गिरधारी भजन पर झूम उठीं। प्रसंग सुनाते-सुनाते कथा वाचक भी भावुक हो गए।