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सोशल मीडिया बैन रोकने में जुटीं टेक कंपनियां: यूरोप में नेताओं की लॉबिंग में खर्च किए 1618 करोड़ रुपये
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नीतीश कुमार
Updated Wed, 25 Feb 2026 06:44 PM IST
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सार
Social Media Ban: यूरोप में किशोरों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध की तैयारी के बीच बड़ी टेक कंपनियां खुलकर मैदान में उतर आई हैं। विज्ञापन, बंद कमरों की बैठकें और भारी लॉबिंग के जरिए ये कंपनियां सख्त कानूनों को रोकने की कोशिश कर रही हैं।
सोशल मीडिया
- फोटो : एआई जनरेटेड
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विस्तार
यूरोप में किशोरों को सोशल मीडिया से दूर रखने की मुहिम तेज हो रही है। कई देश 15 या 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन इस बीच अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियां इस प्रस्ताव को रोकने के लिए पूरी ताकत झोंक रही हैं। इन कंपनियों में मेटा (Meta) और अल्फाबेट (Alphabet) प्रमुख हैं। कंपनियों ने विज्ञापन, लॉबिस्ट और राजनीतिक संपर्कों के जरिए बैन को टालने में पूरी ताकत झोंक दी है। ये कंपनियां राजनीतिज्ञों की लॉबिंग में करोड़ों डॉलर भी खर्च कर रही हैं।
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कई देशों में सोशल मीडिया पर बढ़ रही है सख्ती
सरकारों का कहना है कि इंस्टाग्राम, यूट्यूब और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म किशोरों के लिए लत की तरह काम कर रहे हैं। कुछ शोधों में अत्यधिक स्क्रीन टाइम को डिप्रेशन और आत्महत्या के बढ़ते मामलों से भी जोड़ा गया है।
लॉस एंजेलिस में चल रहे एक अहम मुकदमे में इंस्टाग्राम और यूट्यूब को “डिजिटल कैसीनो” तक कहा गया है। आरोप है कि इन प्लेटफॉर्म्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यूजर्स लगातार स्क्रॉल करते रहें। इस मामले में मेटा के सीईओ मार्क जुकर्बर्ग ने आरोपों को खारिज किया है।
दिसंबर में ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के किशोरों के लिए दुनिया का पहला सोशल मीडिया बैन लागू किया। इसके बाद कई एशियाई देशों ने भी ऐसे कदमों की घोषणा की। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, यूनाइटेड किंगडम और डेनमार्क भी आने वाले महीनों में अपने-अपने नियम ला सकते हैं। अमेरिका के आठ राज्यों में भी इसी तरह के विधेयक पेश किए जा चुके हैं।
सरकारों का कहना है कि इंस्टाग्राम, यूट्यूब और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म किशोरों के लिए लत की तरह काम कर रहे हैं। कुछ शोधों में अत्यधिक स्क्रीन टाइम को डिप्रेशन और आत्महत्या के बढ़ते मामलों से भी जोड़ा गया है।
लॉस एंजेलिस में चल रहे एक अहम मुकदमे में इंस्टाग्राम और यूट्यूब को “डिजिटल कैसीनो” तक कहा गया है। आरोप है कि इन प्लेटफॉर्म्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यूजर्स लगातार स्क्रॉल करते रहें। इस मामले में मेटा के सीईओ मार्क जुकर्बर्ग ने आरोपों को खारिज किया है।
दिसंबर में ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के किशोरों के लिए दुनिया का पहला सोशल मीडिया बैन लागू किया। इसके बाद कई एशियाई देशों ने भी ऐसे कदमों की घोषणा की। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, यूनाइटेड किंगडम और डेनमार्क भी आने वाले महीनों में अपने-अपने नियम ला सकते हैं। अमेरिका के आठ राज्यों में भी इसी तरह के विधेयक पेश किए जा चुके हैं।
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टेक कंपनियां लॉबिंग में खर्च कर रहीं अरबों डॉलर
द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, टेक कंपनियां बैन को रोकने के लिए राजनेताओं की लॉबिंग में जुट गई हैं। टेक कंपनियों ने पिछले साल यूरोपीय संघ में करीब 151 मिलियन यूरो (1618 करोड़ रुपये) लॉबिंग पर खर्च किए। मेटा सबसे ज्यादा (10 मिलियन यूरो) खर्च करने वाली कंपनी रही। गूगल ने भी करीब 4.5 मिलियन यूरो खर्च किए। यूरोप की राजधानी ब्रुसेल्स में ही 890 फुल-टाइम टेक लॉबिस्ट मौजूद हैं, जो यूरोपीय संसद के कुल सदस्यों से भी ज्यादा हैं।
कंपनियां चाहती हैं बैन नहीं, माता-पिता को कंट्रोल दिया जाए
कंपनियों का कहना है कि सरकार को बैन नहीं लगाना चाहिए, बल्कि माता-पिता को बच्चों की गतिविधियों पर नियंत्रण रखने की शक्ति देनी चाहिए। वे दलील देते हैं कि बैन लगाने से बच्चे इंटरनेट के उन 'अंधेरे कोनों' में चले जाएंगे जहां उन पर नजर रखना और भी मुश्किल होगा। मेटा अब अपने 'टीन अकाउंट्स' का प्रचार कर रहा है, जहां माता-पिता को ज्यादा कंट्रोल मिलता है। ब्रसेल्स के रेलवे स्टेशनों पर बड़े-बड़े होर्डिंग का सहारा लेकर भी कंपनियां सोशल मीडिया के खालिफ सख्त कानूनों का विरोध कर रही हैं।
द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, टेक कंपनियां बैन को रोकने के लिए राजनेताओं की लॉबिंग में जुट गई हैं। टेक कंपनियों ने पिछले साल यूरोपीय संघ में करीब 151 मिलियन यूरो (1618 करोड़ रुपये) लॉबिंग पर खर्च किए। मेटा सबसे ज्यादा (10 मिलियन यूरो) खर्च करने वाली कंपनी रही। गूगल ने भी करीब 4.5 मिलियन यूरो खर्च किए। यूरोप की राजधानी ब्रुसेल्स में ही 890 फुल-टाइम टेक लॉबिस्ट मौजूद हैं, जो यूरोपीय संसद के कुल सदस्यों से भी ज्यादा हैं।
कंपनियां चाहती हैं बैन नहीं, माता-पिता को कंट्रोल दिया जाए
कंपनियों का कहना है कि सरकार को बैन नहीं लगाना चाहिए, बल्कि माता-पिता को बच्चों की गतिविधियों पर नियंत्रण रखने की शक्ति देनी चाहिए। वे दलील देते हैं कि बैन लगाने से बच्चे इंटरनेट के उन 'अंधेरे कोनों' में चले जाएंगे जहां उन पर नजर रखना और भी मुश्किल होगा। मेटा अब अपने 'टीन अकाउंट्स' का प्रचार कर रहा है, जहां माता-पिता को ज्यादा कंट्रोल मिलता है। ब्रसेल्स के रेलवे स्टेशनों पर बड़े-बड़े होर्डिंग का सहारा लेकर भी कंपनियां सोशल मीडिया के खालिफ सख्त कानूनों का विरोध कर रही हैं।
डिजिटल फेयरनेस एक्ट से बदल सकता है एल्गोरिदम
टेक कंपनियों को असली चिंता यूरोपीय संघ के प्रस्तावित डिजिटल फेयरनेस एक्ट से है। यह कानून अनंत स्क्रॉलिंग, ऑटो-प्ले वीडियो और एल्गोरिदम आधारित सुझाव जैसी सुविधाओं पर रोक लगा सकता है। इससे प्लेटफॉर्म्स के डिजाइन और बिजनेस मॉडल में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं। यूरोपीय आयोग की उपभोक्ता नीति निदेशक इसाबेल पेरिग्नॉन ने संकेत दिया है कि इस पर साल के अंत तक मतदान हो सकता है।
टेक कंपनियों को असली चिंता यूरोपीय संघ के प्रस्तावित डिजिटल फेयरनेस एक्ट से है। यह कानून अनंत स्क्रॉलिंग, ऑटो-प्ले वीडियो और एल्गोरिदम आधारित सुझाव जैसी सुविधाओं पर रोक लगा सकता है। इससे प्लेटफॉर्म्स के डिजाइन और बिजनेस मॉडल में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं। यूरोपीय आयोग की उपभोक्ता नीति निदेशक इसाबेल पेरिग्नॉन ने संकेत दिया है कि इस पर साल के अंत तक मतदान हो सकता है।