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महाभारत के इन पात्रों के जन्म की कहानी जानकर आप हैरत में पड़ जाएंगे
Updated Sat, 06 Jun 2015 10:42 AM IST
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भगवान शिव ने सृष्टि के विकास के लिए अपने शरीर के आधे भाग से स्त्री को उत्पन्न किया। इसके बाद यह व्यवस्था बनी कि पुरूष और प्रकृति यानी पुरूष और स्त्री के मिलन से संतान का जन्म होगा और सृष्टि का विकास क्रम आगे बढ़ेगा। यह नियम सभी जीव जंतु और मनुष्यों पर लागू है। लेकिन पुराणों में कई कथाएं ऐसी मिलती हैं जिनमें यह बताया गया है कि बिना स्त्री और पुरूष के मिलन के संतान ने जन्म लिया।
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महाभारत के एक प्रमुख पात्र हैं कृपाचार्य जो कौरवों और पाण्डवों के कुल गुरू थे। इनके जन्म के बारे में यह कथा है कि इनके पिता शरद्वान तपस्वी होने के साथ ही धनुर्विद्या में बड़े ही निपुण थे। देवराज इन्द्र ने इन्हें भटकाने के लिए जानपदी नाम की एक कन्या को इनके पास भेजा। इन्हें देखकर शरद्वान का मन कामातुर हो उठा और अनजाने में इनका वीर्य सरकंडे पर गिर गया। इससे एक कन्या और एक बालक का जन्म हुआ जो कृपि और कृपाचार्य कहलाए।
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कृपाचार्य की तरह कौरवों और पाण्डवों के गुरू कृपाचार्य के जन्म की भी अजब कहानी है। द्रोणाचार्य के पिता ऋषि भारद्वाज एक बार गंगा स्नान करने गए। इन्होंने वहां घृताची नाम की अप्सरा नदी से स्नान करके बाहर आते हुए देखा। इससे मन में काम भाव जग उठा और इनका वीर्यपात हो गया जिसे भारद्वाज ने यज्ञ के लिए उपयोग किए जाने वाले एक पात्र में रख लिए जिसे द्रोण कहा जाता था। इसलिए भारद्वाज के पुत्र द्रोणाचार्य कहलाए।
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भगवान श्री राम के जीजा थे ऋंग ऋषि। इनके जन्म की कहानी भी निराली है। इनके पिता काश्यप एक बार किसी सरोवर में स्नान कर रहे थे। तभी वहां उर्वशी नाम की अप्सरा आई। अप्सरा को देखकर इनका शुक्रपात हो गया और जल में मिल गया। इस जल को पीकर एक हिरणी गर्भवती हो गयी और उसने एक बालक को जन्म दिया जिसके सिर पर एक सिंग था जो ऋंग कहलाया। हिरणी के बारे में कहा जाता है कि वह एक देवकन्या थी जो शाप के कारण हिरणी बन गई थी। दशरथ जी को ऋंग ऋषि ने ही पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया था जिससे भगवान राम और उनके भाइयों का जन्म हुआ था।
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राजा द्रुपद को जब द्रोणाचार्य ने युद्घ में हरा दिया तब एक ऐसे पुत्र की इच्छा से द्रुपद ने यज्ञ करवाया जो द्रोणाचार्य का वध कर सके। यज्ञ से एक पुरूष और एक कन्या उत्पन्न हुई पुरूष धृष्टद्युम्न कहलाया और कन्या द्रौपदी कहलायी। महाभारत युद्घ में धृष्टद्युम्न ने द्रोणाचार्य का वध करके पिता के यज्ञ को पूरा किया।
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