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स्कूलों की मनमानी रोकने के दावे हवा हवाई

बिशन सिंह बोरा/ अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 14 Feb 2016 01:34 PM IST
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public school careless about admission.
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उत्तराखंड में पब्लिक स्कूलों की मनमानी रोकने के दावे फिर से हवा हवाई ही साबित हुए। सीएम के एक्ट बनाने के आदेश पर ड्राफ्ट तैयार होने के बावजूद न तो आयोग बना न ही एक्ट शासन की फाइलों से बहार आया।

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शासन अब सुझाव आमंत्रित करने के नाम पर जिस तरह इस मामले को लटकाए हुए हैं, उसे देखकर सरकार और शासन की एक्ट बनाने की मंशा पर ही सवाल उठने लगे हैं। अशासकीय मान्यता प्राप्त एवं पब्लिक स्कूलों में बच्चों के एडमीशन, वार्षिक फीस, छात्रों और अभिभावकों के उत्पीड़न संबंधी शिकायतों को देखते हुए मुख्यमंत्री ने इसके लिए एक्ट बनाने के निर्देश दिए थे।
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प्रस्तावित एक्ट के तहत वार्षिक एवं एडमीशन फीस पर नियंत्रण और शिकायतों के निवारण के लिए एक आयोग गठित होना था। प्रस्तावित एक्ट में यह भी तय किया गया था कि प्रत्येक पब्लिक स्कूल में अनिवार्य रूप से एक पीटीए भी गठित होगा, लेकिन पिछले एक साल बाद भी स्थिति जस की तस है।

तो मनमानी पर लगता आर्थिक दंड
प्रस्तावित एक्ट के तहत गठित होने वाले आयोग में कोई भी व्यक्ति सीधे अपनी शिकायत दर्ज कर सकता है। आयोग इसका संज्ञान लेते हुए न सिर्फ संबंधित जिले के डीएम को कार्रवाई के लिए निर्देशित करता बल्कि शिकायत की पुष्टि होने पर मनमानी करने वाली संबंधित संस्था (स्कूलों) से आर्थिक दंड भी वसूला जा सकता।

एक्ट का ड्राफ्ट तैयार कर शासन को भेजा जा चुका है, शासन स्तर से इसे विधान सभा में रखने के बाद ही एक्ट बनता।
- वीएस रावत, अपर निदेशक शिक्षा महानिदेशालय

एक्ट कैसा हो इसके लिए शिक्षण संस्थाओं एवं व्यक्तियों से सुझाव मांगे जा रहे हैं, विभाग को कुछ सुझाव मिले भी हैं, इसके बाद ही इस पर अमल किया जाएगा।
- डी सेंथिल पांडियन, शिक्षा सचिव

फाइलों से बाहर नहीं निकली आरटीई की जांच
देहरादून के पब्लिक स्कूलों की मनमानी पर रोक के लिए जहां सरकार कानून नहीं बना पा रही है, वहीं कक्षा एक से आठवीं तक के बच्चों के लिए जो एक्ट है उस पर भी अमल नहीं हो पा रहा है।

अमर उजाला के राइट टू एजूकेशन (आरटीई) के तहत पब्लिक स्कूलों की मनमानी का खुलासा करने के बाद शासन ने अलग-अलग जिलों में जांच अधिकारी नामित किए, लेकिन जांच आगे नहीं बढ़ी। जबकि हकीकत यह है कि आरटीई में पात्र बच्चों को लाभ नहीं मिल रहा है।

प्रदेश में आरटीई के दाखिलों में जमकर मनमानी हो रही है। स्थिति यह है कि पात्र बच्चों को जहां एक्ट के अनुरूप पब्लिक स्कूलों में उनके लिए आरक्षित 25 फीसदी सीटों पर दाखिला नहीं मिल रहा है। वहीं, कुछ विद्यालयों में अपात्र बच्चों को दाखिले देने के मामले सामने आए हैं। अक्तूबर वर्ष 2015 में शासन की ओर से मामले में जांच के निर्देश दिए गए थे, इसके लिए अलग-अलग जिलों में जांच अधिकारी भी नामित किए गए, लेकिन जांच रिपोर्ट आज तक नहीं मिली।

स्कूल इस तरह से कर रहे मनमानी
शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत जरूरतमंद और पात्र बच्चों की अनदेखी हो रही है। तेग बहादुर रोड आराघर निवासी मोहन सिंह नेगी ने आरटीई के तहत अपनी पुत्री विदुषी के दाखिले के लिए वर्ष 2015 में आवेदन किया, शिक्षा विभाग की ओर से उनकी पुत्री का चयन भी किया गया, लेकिन पात्र होने के बाद भी बच्ची को दाखिला नहीं मिला। पात्र बच्ची को स्कूल ने दाखिला देने से यह कहकर इनकार कर दिया कि वह छोटी है और सुबह स्कूल के लिए नहीं उठ पाएगी।

आरटीई में मनमानी के प्रकरण की जांच की जा रही है। जनपदों से रिपोर्ट मांगी गई है। जांच रिपोर्ट आने के बाद संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
- वीएस रावत, अपर निदेशक शिक्षा महानिदेशालय

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