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सपा में मुलायम युग का अंत, 25 साल में पहली बार मिली इतनी कड़ी चुनौती

ब्यूरो/ अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 02 Jan 2017 11:21 AM IST
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mulayam singh yadav era end in samajwadi party
फाइल फोटो - फोटो : amar ujala
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क्या समाजवादी पार्टी में मुलायम युग का अंत हो गया है? रविवार को यह सवाल उठना स्वाभाविक ही था। उन्होंने सपा का गठन किया, अपने परिवार को देश का सबसे बड़ा सियासी परिवार बनाया, लेकिन अब राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से बेदखल कर दिए गए। 25 साल तक पार्टी में एकछत्र राज करने वाले मुलायम सिंह यादव को पहली बार इतनी कड़ी चुनौती मिली है। और वह भी किसी बाहरी से नहीं, परिवार से ही। उनका बेटा ही उन पर भारी पड़ा है।

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देश की राजनीति में मुलायम वरिष्ठ राजनीतिज्ञों में शुमार हैं। वह तीन बार मुख्यमंत्री, केंद्र में रक्षा मंत्री रह चुके हैं। इससे पहले वे दोनों सदनों, विधानसभा व विधान परिषद में नेता विरोधी दल रह चुके हैं। 50 साल का राजनीतिक अनुभव रखने वाले मुलायम ने अपने संघर्ष के बल पर राजनीति में जगह बनाई।
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1967 में सोशलिस्ट पार्टी से पहली बार विधायक बनने के बाद से लेकर 2014 में आजमगढ़ और मैनपुरी से लोकसभा में पहुंचने तक मुलायम ने राजनीति में तमाम उतार-चढ़ाव देखे हैं। अब भी वह पूरी तरह एक्टिव हैं। अपने संघर्ष व जीवट की बदौलत वे हमेशा मजबूत होकर उभरे, लेकिन लगता है अब वह दौर बीत गया है। 

जिन नेताओं को नेताजी ने फर्श से अर्श तक पहुंचाया, वे भी रविवार को मुलायम की जगह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने का हाथ उठाकर समर्थन कर रहे थे। मुलायम की छत्रछाया में राजनीति का ककहरा सीखने वाले उनके नजदीकी शिवपाल को हटाए जाने के प्रस्ताव पर दस्तखत कर रहे थे।


 

​विधायकों का बहुमत अखिलेश के साथ

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फाइल फोटो - फोटो : amar ujala
​विधायकों का बहुमत अखिलेश के साथ है। मुलायम ने जिन्हें मंत्रिमंडल में शामिल कराया, वे भी अखिलेश के साथ खड़े हैं। उनका कहना है कि अखिलेश ने मुख्यमंत्री के रूप में शानदार काम किया है। उनकी छवि और चेहरे पर चुनाव लड़ा जाएगा। नेताजी सभी के मार्गदर्शक हैं लेकिन भविष्य के नेता अखिलेश हैं। ये घटनाक्रम मुलायम युग की समाप्ति का संकेत दे रहे हैं।

चरण सिंह के भरोसेमंद रहे मुलायम
मुलायम 1967 में पहला विधानसभा चुनाव संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जीते थे। उसके बाद से वह चौधरी चरण सिंह के साथ रहे। पहली बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 1974 का चुनाव वह चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल से लड़े। 1977 में इसका जनता पार्टी में विलय हो गया। मुलायम जनता पार्टी से लड़कर विधायक बने और सहकारिता मंत्री बनाए गए। 

1980 में वह विधानसभा चुनाव हार गए। इसके बाद चरण सिंह ने उन्हें विधान परिषद सदस्य, लोकदल का प्रदेश अध्यक्ष और विधान परिषद में नेता विरोधी दल बनाया। 1986 में चरण सिंह के बीमार होने तक मुलायम उनके सबसे भरोसेमंद लोगों में शामिल थे। 

पहला टकराव अजित से हुआ
चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद मुलायम का पहला टकराव चौधरी अजित सिंह से हुआ। नतीजतन अजित सिंह और हेमवती नंदन बहुगुणा की अगुवाई में लोकदल दो धड़ों में बंट गया। बहुगुणा ने मुलायम को लोकदल (ब) का प्रदेश अध्यक्ष बनाया। इसके बाद उन्होंने क्रांतिकारी मोर्चा बनाया और रथयात्रा निकाली। 1989 के चुनाव से पहले इन सभी दलों का विलय होकर जनता दल बना।

1989 में शक्ति परीक्षण से बने सीएम

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फाइल फोटो - फोटो : amar ujala
1989 में शक्ति परीक्षण से बने सीएम
1989 में जनता दल की सरकार बनने पर मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार थे, मुलायम और अजित। विधानमंडल की बैठक में दोनों के बीच शक्ति परीक्षण हुआ। इसमें जीतने पर मुलायम प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। यह उनके लिए राजनीति का टर्निंग पॉइंट बना। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बड़ी से बड़ी चुनौती से जूझते रहे।

कारसेवकों पर गोलीबारी थी बड़ा फैसला
मुलायम सिंह के मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन काफी गरमा चुका था। विवादित स्थल पर कारसेवकों पर गोलियां चलाई गईं। इसके बाद उन्हें मुल्ला मुलायम जैसे विशेषणों से नवाजा गया। हालांकि मुलायम कहते रहे हैं कि देश के संविधान में अल्पसंख्यकों का भरोसा कायम रखने के लिए उन्होंने मजबूरी में गोली चलवाई।

1992 में बनाई सपा
इस घटना के बाद 1991 के चुनाव में मुलायम की सजपा को मात्र 31 सीटें मिलीं। इसके बाद उन्होंने 1992 में समाजवादी पार्टी का गठन किया। 1993 में बसपा से गठबंधन करके विधानसभा चुनाव लड़ा और प्रदेश में सरकार बनाई। 2003 में वे फिर मुख्यमंत्री बने। पिछले 25 वर्षों से वह प्रदेश में प्रमुख सियासी ताकत बने हुए हैं। पहली बार भाई रामगोपाल और बेटे अखिलेश ने उन्हें चुनौती दी है। जिस पार्टी को उन्होंने बनाया, उसी के अध्यक्ष पद से हटा दिए गए।
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