कलरव करते पंछियों संग हुआ प्रभात का अहसास।
रक्तवर्ण स्वर्णिम किरणों से चमक उठा आकाश।।
गहन निद्रा का त्याग कर जीवन संचय हित दौड़े।
रक्तवर्ण से रजत वर्ण हो सूर्य के घोड़े फिर दौड़े।।
आलस्य प्रमाद न रहा फिर जन का संगी साथी।
मस्त मलंग झूम रहा इंसान बन जंगल का हाथी।।
सुप्रभात की कोयल किरणों से मन में चेतना जागी।
हुई रात्रि बेगानी सी तन से सुस्ती छूमंतर भागी।।
चन्द्र शेखर मार्कंडेय
अमरोहा, उत्तर प्रदेश
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