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साथ का सफर

                
                                                         
                            धीरे शाम ढली,
                                                                 
                            
नील गगन खामोश हुआ।
रोशनी ने घर के अंदर,
जगमगाहट ला दिया।

फूलों की खुशबू ने,
घर के कोने सब महका दिये।
चमक उठी आँखें बिकल हो
ख्याल पुराने आ गए।

वर्ष बयालीस हमसफ़र के
प्यारमय बीते जहां।
साथ हर पल में रहे,
दूर रहके दिल यहां।

कोई पल ऐसा नहीं कि,
भूल भी पाएं कभी ।
देश के कोने कोने में,
भ्रमण कर पाए तभी।

मधुर जीवन की थी घड़ियाँ,
मधुर था सारा जहाँ।
जब कभी भी थे अकेले,
दिल व मन सब था वहां।

अब बचे दिन की है ख्वाहिश,
साथ यूं चलते रहें।
चाँद सूरज की तरह ही,
याद हम आते रहें।
-सूबा लाल "अंजाना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 घंटे पहले

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