झरित पर्ण, रिक्त पथ, नीलिमा-निःशब्द,
बीज-स्मृति, अनाम क्षण, शून्य-गर्भ स्पंद।
मिटती रेखा-छवि, मौन में शेष न किंचित,
तभी भीतर उठता, अनंत का प्रथम छंद।
सूर्य-विलय, क्षितिज-श्वास, स्वर्णिमा-लोप,
तम-वीणा, नीरव लय, ज्योति का अवरोध।
न निशा न उषा, केवल रिक्त-सा वितान,
और उसी रिक्त में जागे नव प्रभात-बोध।
दीप-भस्म, अंगार-स्वप्न, लुप्त तेज-रेख,
धूम-आवरण, मौन अग्नि, अदृश्य विवेक।
शून्य-जाप, पवन-झंकार, अनाहत स्वर,
बिना जन्म के भीतर उठता अग्नि-आलेख।
जल-बिंदु, सागर-गर्भ, लय-निर्वाण-धाम,
तट-विस्मरण, तरंग-शून्य, अनंत विराम।
न सीमा न केंद्र, केवल विस्तृत अनाम,
और उसी अनाम में पूर्णता का प्रणाम।
-सनातन मुकुंद
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