आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

समत्व-बोध : दार्शनिक प्रगीत

                
                                                         
                            मलयानिल-मृदुलहर, सुरम्य जीवनार्पण,
                                                                 
                            
हास-सुमन सम मन, मैं जीवन दर्पण।
पावस-श्रावणरात्रि तत्, अतृप्त स्वप्नानुराग,
अश्रुबूँद, श्रांत गति, मैं जीवन काल विराग।

सुख-दुख संगमतट, जीवन-तरणि तरंग,
राग विराग संगीत, अंतस मधुर उमंग।
मैं सुख एक क्षण, असत, सतत गतिमान,
मग्न राग मम, भ्रम-वरण, अधि-सोपान।

मैं दु:ख हृदय-मीत, तप सकल-विहान,
सत् सम अनुताप, प्रकृति सृजन-गान।
समत्वयोग पथपथिक, मैं चित्त विभोर,
हर्ष न शोकसन्तप्त, द्वंद्व-मुक्त मैं अघोर।

सुखमद न दु:खभार, समत्व जीवनाधार,
हास-रति न क्रंदन-विरति, द्रुत भव-संसार।
द्युति-छाया ब्रह्म विधान, माया-जगत-सार,
सम-भाव अमित-प्रवाह, भव-मुक्ति प्रसार।

सुख-दुःख काल-लय, भोग-नियोग संयोग,
अद्वैत-सम परमगति, नित्यानित्य-आनंद प्रयोग।
-सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर