दीप तुम्हारा, ज्योति तुम्हारी, मेरा केवल प्रकाश।
स्वर्ण प्रभा के मृदु मन्दिर में, चिदालोक विलास॥
अन्तर आँगन, अरुणिम अर्चन, मंगलमय आलोक।
रोम रोम में रश्मि निकुञ्ज, सुरभित चिदालोक॥
इन्दु प्रभा की मृदु रजतिमा, प्राण पटल का हार।
निशि नीलिमा के उर में जैसे, तारक गण श्रृंगार॥
आलोकित प्रतिच्छवि एक, एक प्रतीति प्रकाश।
सीमा रहित सलिल में जैसे, नभ का नील निवास॥
किसलय कम्पन, मधु मरन्द, मलय अनिल का स्पर्श।
अन्तः वीणा, अनहद नाद, मौन मधुर उत्कर्ष॥
नाम रहित अनुरक्ति सुगन्ध, रूप रहित अभिसार।
चिर परिचित पदरज की रेखा, अनुगन्धित सत्कार॥
सरिता संवित्, सिन्धु चेतना, एक तरल विस्तार।
बिन्दु बिन्दु में पूर्ण अमृत, पूर्णत्व अपार॥
दीप तुम्हारा, ज्योति तुम्हारी, मेरा केवल प्रकाश।
तुममें मुझमें एक चिदम्बर, एक अनन्त निवास॥
- सनातन मुकुंद
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