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ज्ञान-शिरोमणे : व्याजस्तुतिपरक व्यंग्यगीत

                
                                                         
                            हे ज्ञान-शिरोमणे! शतशः तुम्हें प्रणाम,
                                                                 
                            
तुमसे ही आलोकित होता, भ्रम का विस्तृत धाम।

अक्षर-द्वार अभी अनखुला, वेदार्थों की चर्चा,
बिन्दु न जाना, किन्तु गगन की करते नित्य परीक्षा।
प्रश्न खड़े संकोच-वसन में, उत्तर लिये ललाम,
हे ज्ञान-शिरोमणे! शतशः तुम्हें प्रणाम।।

जब-जब संकट द्वार खटखटाए, तुम समाधान लाते,
जलती ज्वाला पर जल न देकर घृत-कलश बरसाते।
अधरों पर आशीष विराजे, अंतर गुप्त संग्राम,
हे ज्ञान-शिरोमणे! शतशः तुम्हें प्रणाम।।

स्वयं भटके चौराहों पर, पथ-निर्देश सुनाते,
छाया के अनुलेख पढ़ाकर, सूर्योदय समझाते।
अल्प सुधा की बूँद सँजोकर, सागर-सा अभिमान,
हे ज्ञान-शिरोमणे! शतशः तुम्हें प्रणाम।।

रजकण में गिरिराज निहारें, गिरिराज में रजकण,
छाया को सूर्योदय लिखते, तम को कह देते किरण।
निज पदचापों की प्रतिध्वनि को मानें जय-जयगान।
हे ज्ञान-शिरोमणे! शतशः तुम्हें प्रणाम।।
-सनातन मुकुंद
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11 घंटे पहले

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