हे ज्ञान-शिरोमणे! शतशः तुम्हें प्रणाम,
तुमसे ही आलोकित होता, भ्रम का विस्तृत धाम।
अक्षर-द्वार अभी अनखुला, वेदार्थों की चर्चा,
बिन्दु न जाना, किन्तु गगन की करते नित्य परीक्षा।
प्रश्न खड़े संकोच-वसन में, उत्तर लिये ललाम,
हे ज्ञान-शिरोमणे! शतशः तुम्हें प्रणाम।।
जब-जब संकट द्वार खटखटाए, तुम समाधान लाते,
जलती ज्वाला पर जल न देकर घृत-कलश बरसाते।
अधरों पर आशीष विराजे, अंतर गुप्त संग्राम,
हे ज्ञान-शिरोमणे! शतशः तुम्हें प्रणाम।।
स्वयं भटके चौराहों पर, पथ-निर्देश सुनाते,
छाया के अनुलेख पढ़ाकर, सूर्योदय समझाते।
अल्प सुधा की बूँद सँजोकर, सागर-सा अभिमान,
हे ज्ञान-शिरोमणे! शतशः तुम्हें प्रणाम।।
रजकण में गिरिराज निहारें, गिरिराज में रजकण,
छाया को सूर्योदय लिखते, तम को कह देते किरण।
निज पदचापों की प्रतिध्वनि को मानें जय-जयगान।
हे ज्ञान-शिरोमणे! शतशः तुम्हें प्रणाम।।
-सनातन मुकुंद
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