जीवन-पथ पर धूलि बिखेरी, पग-पग शूल उगाए थे,
आज उसी निर्जीव देह पर, सुमन-वितान सजाए थे।।
जब तक श्वासों में स्पन्दन था, तब तक कौन सहारा था,
नयन प्रतीक्षारत थे जिनके, उनका नहीं किनारा था।
अब निष्पन्द कपोलों पर वे, करुणा-अश्रु बहाए थे,
आज उसी निर्जीव देह पर, सुमन-वितान सजाए थे॥
जर्जर तन की क्षीण व्यथाएँ, सुनने कौन रुका घर में,
दुःख की साँझ अकेली रोई, मौन खड़ा था अन्तर में।
आज चन्दन-लेपित अङ्गों पर, गन्ध-सुधा बरसाए थे,
आज उसी निर्जीव देह पर, सुमन-वितान सजाए थे॥
अन्न-कणों को तरसा मुख जो, दान-दक्षिणा पाता है,
जीवन भर जो तिरस्कृत था, मृत्युपरान्त सराहा है।
जो न कभी उर से जुड़ पाए, कन्धा देने आए थे,
आज उसी निर्जीव देह पर, सुमन-वितान सजाए थे॥
अग्नि-जिह्वा जब लपट बनी तो, मुख-मण्डल पहचान गया,
कितना क्षणभंगुर सम्बन्धों का यह सारा अभियान गया।
राख हुई अभिलाषा सारी, स्वप्न सभी झर आए थे,
आज उसी निर्जीव देह पर, सुमन-वितान सजाए थे॥
देख धुएँ में विलय जगत को, अन्तर्मन मुस्काता था,
मृत्यु नहीं थी केवल मृत्यु, जीवन-सत्य बताता था।
जिनको जागृत होना था वे, उत्सव-भाव में छाए थे,
आज उसी निर्जीव देह पर, सुमन-वितान सजाए थे॥
मिथ्या मान-मद-मोह-मरीचिका, क्षण में धूलि समान हुई,
अन्त्याग्नि की एक शिखा से, जग की गति पहचान हुई।
जीवन भर जो दूर रहे थे, शोक-सभा में आए थे,
आज उसी निर्जीव देह पर, सुमन-वितान सजाए थे॥
- सनातन मुकुंद
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