गीत गाता चल रे पंक्षी प्रीत गाता चल
हम है राही प्यार के प्रेम का गीत गाता चल ,
विवेक हमारी तीव्र मन अपना चंचल ,
हम सब है मन के कैदी , चल कर ले थोड़ी मन मर्जी ,
फंसे है हम सब स्वार्थ के पिंजरे में इसे तोड़ निस्वार्थ के गगण में मोह माया की बेड़ी से उन्मुक्त होकर प्रीत गाता चल रे पंक्षी प्रेम का गीत गाता चल ।
ये है छालावे की दुनिया यहां कोई राजा तो कोई है रंक दुनिया बजा रही है छालावे का मृंदग ,
सब कुछ है छनभंगूर फिर क्यों है हम सब अहंकार से चुर ,
हम सब है अंजान परिंदा ,हम सब है नदान परिंदा
यहां है अपना किराए का घरौंदा , हम सब है चार दिन का बसिंदा ,
इस मया , छाया की दुनिया में स्वार्थ कर रहा है खेला ,
यहां सबका तन चंदन मन है मैला ,
हम है राही प्यार के मन से प्रीत जोड़
स्वार्थ के पिंजरा तोड़ रे पंक्षी स्वार्थ के पिंजरा तोड़ ,
प्रेम के गीत गाता चल रे पंक्षी प्रीत गाता चल ।
चार दिन की है ये जिंदगी चार दिन का है यहां बसेरा ,
यहां किसे है ज्ञात आज अंधेरा बिता क्या कल होगा हमरा सबेरा ,
हम सब यहां फकीर किस्मत की हाथों में खिंची है लकीर ,
वक्त यहां है बलवान हम कठपुतली पहने है सांसों की परिधान ,
सोती रात की सपनों को सोये हुए ख्वाबों से मत जगा '
रेत की महल को कनक की मुकूट से मत सजा ,
कौड़ी की हैसियत नही है यहां तेरी या मेरी ,
चंद मिनट में यमराज कंठ धरेगा ,
किसी को आगे तो किसी को पिछे ,
अमीर हो या गरीब वहां है सबकी एक हीं लकीर
खुद को जान लो रे परिंदा हम सब है फकीर ,
स्वार्थ के पिंजरा तोड़ रे पंक्षी ,
हम है राही प्यार के,
गीत गाता चल रे पंक्षी प्रीत गाता चल
प्रेम के गीत गाता चल । ॥
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