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कश्मीर में अलगाववादियों से बातचीत को केंद्र पर दबाव बना रही पीडीपी

राघवेंद्र नारायण मिश्र,अमर उजाला/जम्मू Updated Wed, 26 Apr 2017 10:29 AM IST
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modi government will talk to separatists within the framework of the Constitution
पीएम नरेंद्र मोदी व महबूबा मुफ्ती - फोटो : File Photo
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यह महज संयोग नहीं है कि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात के तुंरत बाद यूनिफाइड कमांड की बैठक की जरुरत महसूस की। इस पहल को सेना और सुरक्षा बलों और रियासत सरकार के बीच कुछ मुद्दों पर पैदा हुए विवाद को सुलझाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
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दिल्ली से लौटते ही महबूबा अमन बहाली के लिए जिस रूप में सक्रिय हुईं हैं उससे केंद्र द्वारा मिली मोहलत से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हिंसा के मौजूदा हालात में दो-तीन महीने में स्थिति सामान्य बनाना आसान नहीं दिखता लिहाजा इसके लिए पीडीपी अलगाववादी शरणम गच्छामि की नीति पर अमल चाहती है। इसके लिए वह केंद्र पर दबाव बना रही है। उधर केंद्र ने दो टूक संदेश दे दिया है कि संविधान के दायरे से बाहर कोई बातचीत संभव नहीं है।
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रियासत सरकार अमन बहाली में अलगाववादियों से मदद मांग रही है लेकिन अलगाववादियों की जमात ने इसे अनसुना कर दिया है। उपद्रवी और आतंकी संगठनों में मजबूत गठजोड़ कायम होने से स्थिति ज्यादा बिगड़ी है। पीडीपी सूत्रों के मुताबिक पत्थरबाज को जीप की बोनट पर बांधकर घुमाने का वीडियो वायरल होने के कारण ही पीडीपी पर कश्मीर केंद्रित पार्टियों का हमला बढ़ा।

इसके साथ ही ग्रामीण इलाकों से लेकर ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर तक पीडीपी नेताओं पर खतरा भी बढ़ा। इसके बाद मुख्यमंत्री ने डीजीपी को फोन कर सेना पर एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए। सेना और सुरक्षा बलों ने इसे आतंक विरोधी कार्रवाई में रियासत सरकार का हस्तक्षेप माना। इस कारण विवाद की स्थिति पैदा हुई। जम्मू कश्मीर में अफस्पा के तहत सेना को विशेष अधिकार मिले हुए हैं।

​पार्टी में विद्रोह से बचना चाहती हैं महबूबा

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MEHBOOBA MUFTI - फोटो : File Photo
केंद्र ने साफ कर दिया है कि आतंक के मामले में कोई रियासत देना संभव नहीं है। साथ ही केंद्र और भाजपा उस सरकार को बचाना भी चाहती है जिसमें वह खुद भागीदार है। दरअसल राज्यपाल शासन की स्थिति से भाजपा की असफलता भी जुड़ सकती है। इसलिए सरकार को पूरे कार्यकाल तक चलाना में ही भाजपा और पीडीपी दोनों के हित निहित हैं। सेना से जुड़े सूत्रों के मुताबिक केंद्र ने सुरक्षा बलों को उपद्रवियों से निपटने में सख्ती बरतने की छूट दी है।

उधर पीडीपी कार्रवाई में नरमी चाहती है। पुलवामा कालेज के छात्रों द्वारा सुरक्षा बलों पर पथराव और बाद में सुरक्षा बलों की कार्रवाई में छात्रों के घायल होने से अलगाववादियों को अपनी सियासत चमकाने का सुनहरा मौका मिल गया। छात्र सड़कों पर आए तो भाड़े के पत्थरबाजों को नई ताकत मिल गई।

पार्टी में विद्रोह की आशंका ने भी महबूबा की सक्रियता बढ़ाई है। तारिक हमिद कर्रा द्वारा पार्टी छोड़ने, कुछ विधायकों और मंत्रियों के असंतोष का असर श्रीनगर उपचुनाव में भी दिखा। पीडीपी की यह सीट हाथ से निकल गई। यही कारण है कि महबूबा ने दिल्ली से लौटते ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने पीएम से बातचीत का ब्योरा देकर अपनी स्थिति स्पष्ट की। 
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