{"_id":"6993a22bdfb044eee50b06a5","slug":"climate-crisis-kyoto-protocol-still-relevant-after-28-years-made-emission-cuts-a-responsibility-2026-02-17","type":"story","status":"publish","title_hn":"जलवायु संकट: 28 साल बाद भी प्रासंगिक क्योटो प्रोटोकॉल, इसने उत्सर्जन कटौती को जिम्मेदारी में बदला","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
जलवायु संकट: 28 साल बाद भी प्रासंगिक क्योटो प्रोटोकॉल, इसने उत्सर्जन कटौती को जिम्मेदारी में बदला
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Tue, 17 Feb 2026 04:33 AM IST
विज्ञापन
सार
28 साल पहले अपनाया गया क्योटो प्रोटोकॉल पहला ऐसा वैश्विक समझौता था जिसने विकसित देशों को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य किया और जलवायु कार्रवाई को जिम्मेदारी में बदला। यह समझौता इस सिद्धांत पर आधारित है कि जलवायु संकट से निपटना सभी की जिम्मेदारी है, लेकिन ज्यादा प्रदूषण करने वाले देशों की जिम्मेदारी ज्यादा होगी। कड़ी निगरानी और नियमों के साथ यह समझौता आज भी दुनिया की जलवायु नीति की मजबूत नींव बना हुआ है। पढ़ें रिपोर्ट-
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : एएनआई (फाइल)
विज्ञापन
विस्तार
आज से 28 साल पहले अपनाया गया क्योटो प्रोटोकॉल दुनिया का पहला ऐसा अंतरराष्ट्रीय समझौता बना, जिसने विकसित देशों को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य किया। 11 दिसंबर 1997 को जापान के क्योटो शहर में स्वीकृत और 16 फरवरी 2005 से लागू हुए इस समझौते ने सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारी के सिद्धांत को व्यवहारिक रूप दिया। 192 देशों की भागीदारी वाला यह प्रोटोकॉल आज भी वैश्विक जलवायु नीति की आधारशिला है।
क्योटो प्रोटोकॉल संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के तहत तैयार किया गया था। जहां यूएनएफसीसीसी देशों से केवल नीतिगत प्रयास और रिपोर्टिंग की अपेक्षा करता है, वहीं क्योटो प्रोटोकॉल ने पहली बार औद्योगिक देशों पर उत्सर्जन घटाने की कानूनी जिम्मेदारी तय की। इसका लक्ष्य वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों को सीमित करना था, ताकि वैश्विक तापमान वृद्धि को रोका जा सके।
वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं कि बढ़ता उत्सर्जन चरम मौसम, समुद्र स्तर वृद्धि, सूखा और बाढ़ जैसी आपदाओं को तेज कर रहा है यह समझौता “सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारी और संबंधित क्षमताओं” के सिद्धांत पर आधारित है। इसका सीधा अर्थ है कि जलवायु संकट से निपटना सभी देशों का साझा दायित्व है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से ज्यादा प्रदूषण करने वाले विकसित देशों की जवाबदेही अधिक है। इसी कारण क्योटो प्रोटोकॉल के तहत बाध्यकारी लक्ष्य केवल विकसित देशों और संक्रमणशील अर्थव्यवस्थाओं पर लागू किए गए, जबकि विकासशील देशों को कानूनी कटौती लक्ष्य से मुक्त रखा गया। क्योटो प्रोटोकॉल के एनेक्स-बी में 37 विकसित देशों और यूरोपीय संघ के लिए औसतन पांच प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस कटौती का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
पहली प्रतिबद्धता अवधि 2008 से 2012 तक चली, जिसमें इन देशों को 1990 के स्तर की तुलना में उत्सर्जन कम करना था। यह पहली बार था जब किसी वैश्विक समझौते के तहत देशों को कानूनी रूप से उत्सर्जन घटाने का निर्देश दिया गया जिसे जलवायु कूटनीति में निर्णायक मोड़ माना जाता है।
ये भी पढ़ें: Solar eclipse: साल का पहला सूर्य ग्रहण आज, भारत में नहीं दिखेगा रिंग ऑफ फायर
निगरानी व्यवस्था व जवाबदेही तंत्र
क्योटो प्रोटोकॉल ने उत्सर्जन की निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन के लिए सख्त व्यवस्था बनाई। सदस्य देशों को हर साल अपने उत्सर्जन का विस्तृत विवरण देना होता है। अंतरराष्ट्रीय कार्बन लेनदेन और क्रेडिट का रिकॉर्ड रखा जाता है। यदि कोई देश तय लक्ष्य हासिल नहीं करता तो अनुपालन प्रणाली उसे सुधारात्मक कदम अपनाने के लिए बाध्य करती है जिससे पारदर्शिता बनी रहती है।
Trending Videos
क्योटो प्रोटोकॉल संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के तहत तैयार किया गया था। जहां यूएनएफसीसीसी देशों से केवल नीतिगत प्रयास और रिपोर्टिंग की अपेक्षा करता है, वहीं क्योटो प्रोटोकॉल ने पहली बार औद्योगिक देशों पर उत्सर्जन घटाने की कानूनी जिम्मेदारी तय की। इसका लक्ष्य वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों को सीमित करना था, ताकि वैश्विक तापमान वृद्धि को रोका जा सके।
विज्ञापन
विज्ञापन
वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं कि बढ़ता उत्सर्जन चरम मौसम, समुद्र स्तर वृद्धि, सूखा और बाढ़ जैसी आपदाओं को तेज कर रहा है यह समझौता “सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारी और संबंधित क्षमताओं” के सिद्धांत पर आधारित है। इसका सीधा अर्थ है कि जलवायु संकट से निपटना सभी देशों का साझा दायित्व है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से ज्यादा प्रदूषण करने वाले विकसित देशों की जवाबदेही अधिक है। इसी कारण क्योटो प्रोटोकॉल के तहत बाध्यकारी लक्ष्य केवल विकसित देशों और संक्रमणशील अर्थव्यवस्थाओं पर लागू किए गए, जबकि विकासशील देशों को कानूनी कटौती लक्ष्य से मुक्त रखा गया। क्योटो प्रोटोकॉल के एनेक्स-बी में 37 विकसित देशों और यूरोपीय संघ के लिए औसतन पांच प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस कटौती का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
पहली प्रतिबद्धता अवधि 2008 से 2012 तक चली, जिसमें इन देशों को 1990 के स्तर की तुलना में उत्सर्जन कम करना था। यह पहली बार था जब किसी वैश्विक समझौते के तहत देशों को कानूनी रूप से उत्सर्जन घटाने का निर्देश दिया गया जिसे जलवायु कूटनीति में निर्णायक मोड़ माना जाता है।
ये भी पढ़ें: Solar eclipse: साल का पहला सूर्य ग्रहण आज, भारत में नहीं दिखेगा रिंग ऑफ फायर
निगरानी व्यवस्था व जवाबदेही तंत्र
क्योटो प्रोटोकॉल ने उत्सर्जन की निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन के लिए सख्त व्यवस्था बनाई। सदस्य देशों को हर साल अपने उत्सर्जन का विस्तृत विवरण देना होता है। अंतरराष्ट्रीय कार्बन लेनदेन और क्रेडिट का रिकॉर्ड रखा जाता है। यदि कोई देश तय लक्ष्य हासिल नहीं करता तो अनुपालन प्रणाली उसे सुधारात्मक कदम अपनाने के लिए बाध्य करती है जिससे पारदर्शिता बनी रहती है।
विज्ञापन
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.
विज्ञापन
विज्ञापन