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...तो जेल से भी चुनाव लड़ सकेंगे 'माननीय'

अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 07 Feb 2014 02:42 PM IST
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prisioner can contest the elections from jail
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दिल्ली हाईकोर्ट ने विचाराधीन कैदियों और पुलिस हिरासत में रहने वाले लोगों पर चुनाव लड़ने पर रोक लगाने से इंकार कर दिया है।

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अदालत ने कहा कि अगर ऐसा किया गया तो सत्तारूढ़ दल अपने विरोधियों को चुनाव से रोकने के लिए अपने अधिकारों का दुरुपयोग करेगा। इसके अलावा जब तक किसी को दोषी नहीं ठहरा दिया जाता कानून की नजर में वह निर्दोष है।

मुख्य न्यायाधीश एनवी रामन और न्यायमूर्ति मनमोहन की खंडपीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा, ‘हमारा मानना है कि सजा व ट्रायल दोनों अलग है। हमारे न्यायिक सिस्टम का सिद्धांत है कि जब तक किसी को दोषी नहीं ठहराया जाता तब तक वह निर्दोष है।’
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अदालत ने कहा हर नागरिक को चुनाव लड़ने का अधिकार है। अगर विचाराधीन कैदियों पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया तो राजनीतिक पार्टियां विशेषकर सत्तारूढ़ दल उसका दुरुपयोग करने लगेगा।

उन्होंने कहा कि किसी भी विरोधी व्यक्ति को अगर चुनाव लड़ने से रोकना होगा तो उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज कराकर उसे गिरफ्तार करवा दिया जाएगा। अदालत ने कहा कि उनकी नजर में संविधान में जो प्रावधान किया गया है, वह उचित है और ऐसे मे जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा में किए गए संशोधन को रद्द नहीं किया जा सकता।

वोट का नहीं है मौलिक अधिकार
खंडपीठ ने अपने फैसले में याची के उस तर्क को भी खारिज कर दिया कि जब जेल में बंद व्यक्ति को वोट का अधिकार नहीं है तो उसे चुनाव लड़ने की इजाजत कैसे दी जा सकती है। कहा कि वोट का अधिकार संवैधानिक और मौलिक अधिकार नहीं है। वोट का अधिकार वैधानिक अधिकार है। ऐसे में सरकार को तय करना है कि वोट के अधिकार को कैसे देना है। याची अधिवक्ता एमएल शर्मा ने कहा था कि राजनीति में अपराधीकरण को रोकने के लिए जेल में बंद विचाराधीन कैदियों और पुलिस हिरासत में रहने वाले लोगों को चुनाव लड़ने को रोका जाए।

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