भारत की व्यास घाटी के लोगों की ओली सरकार से नाराजगी, बोले- चीन के हाथों की कठपुतली बना नेपाल
- भारतीय क्षेत्र को अपने नक्शे में दर्शाने और उसे पास कराने की खबर पर सीमांत के लोग ओली सरकार से नाराज
- सीमांत वासी बोले, नेपाल मित्र राष्ट्र है, लेकिन मौजूदा समय में उसके हर कदम पर गंभीरता से नजर रखने की जरूरत
- बुजुर्गों का साफ कहना, अपने बुजुर्गों से भी नहीं सुना नेपाल ने कभी लिंपियाधुरा पर अपना दावा किया हो
विस्तार
नेपाल के नए नक्शे और निशान को नेपाली राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी की मंजूरी मिलने की खबर से भारत की व्यास घाटी के सात गांवों के लोगों में ओली सरकार के प्रति काफी नाराजगी है। सीमांत गांव के बुजुर्गों का दो टूक कहना है कि नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार चीन के हाथों की कठपुतली बन गई है और नेपाल-भारत के रोटी-बेटी के रिश्तों को तोड़ने में जुटी है। वहीं रं समाज के लोगों का कहना है कि नेपाल की इस हरकत से दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी के रिश्ते पर असर पड़ेगा। सीमांत के नागरिकों का मानना है कि नेपाल हमारा मित्र राष्ट्र है, लेकिन मौजूदा समय में भारत सरकार को उसके हर कदम पर गंभीरता से नजर रखनी चाहिए।
व्यास घाटी के सात गांव के लोगों ने बताया कि नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ नेता कुछ वर्षों में कभी कभार ‘कालापानी हमरो हो’ करके आंदोलन करते रहते थे। उसपर सीमांत के दोनों देश के स्थानीय लोगों ने कभी भी इस प्रकार के आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया। ये सारे आंदोलन धनगड़ी या काठमांडू में हुआ करते थे, लेकिन इस बार अपने नक्शे में लिंपियाधुरा को दर्ज करने पर बॉडर के तीन गांव कुटी, नाबी और गुंजी के ग्रामीणों ने नेपाल की इस हरकत के पीछे पूरी तरह चीन का हाथ होना बताया। क्योंकि नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार चीन सरकार के हाथ की कठपुतली की तरह कार्य कर रही है।
कुटी गांव निवासी 62 वर्षीय गोपाल सिंह कुटियाल ने बताया कि उन्होंने अपने बुजुर्गों से भी कभी नहीं सुना कि कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा पर नेपाल ने कभी अपना दावा किया हो। उन्होंने बताया कि अंग्रेजों के शासनकाल और नेपाल राजा-महाराजा के समय से पहले से व्यास घाटी के सात गांव के अलावा मालपा, लामारी, बुंदी, गर्ब्यांग और गुंजी के महाकाली गंगा पार नेपाल की जमीन नमजुंग आदि बुग्यालों के सैकड़ों नाली की भूमि में सैकड़ों वर्षों से हमारे रं समाज के बुजुर्ग लोग खेती करने, जड़ी बूटी लेने और अपने जानवरों को चराने जाते थे।
नेपाल में राजशाही खत्म होने के बाद से भारतीय रं समाज के लोगों ने इन इलाकों में जाना कम कर दिया। साथ ही कुछ लोगों ने नेपाल में अपनी जमीनों को वहीं रह रहे अपने रिश्तेदारों के नाम कर दिया। अब भी इन इलाकों में मकान के खंडहर पड़े हैं। नाबी निवासी राजन सिंह नबियाल ने बताया नेपाल के इस कदम ने सीमांत का माहौल बिगाड़ दिया है और इससे रोटी-बेटी के रिश्ते पर भी असर पड़ेगा। नेपाल में हमारे बुजुर्गों के समय की सैकड़ों नाली भूमि अब भी पड़ी हुई है। उस पर हमारे रं समाज के लोग अपना दावा इसलिए नहीं करते हैं कि कहीं दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता खराब ना हो जाए।
भारत ने किसी की भी एक इंच भूमि नहीं कब्जाई
पूर्व जिला पंचायत उपाध्यक्ष बहादुर सिंह पाटनी ने नेपाल के नए नक्शे को इतिहास के साथ छेड़छाड़ बताया है। पाटनी ने बताया कि कालापानी क्षेत्र को लेकर वर्ष 1816 में तत्कालीन नेपाल नरेश और हिंदुस्तान के ब्रिटिश हुकमरानों के बीच सिगौली संधि हुई थी। अंग्रेज हुकमरानों ने 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान (पूर्वी पाकिस्तान अब बांग्लादेश, एवं पश्चिमी पाकिस्तान) को स्वतंत्र किया, जिसके दूसरे दिन 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्र किया गया। अंग्रेजों ने जितना भूभाग भारत को सौंपा उसमें भारत ने किसी की भी एक इंच भूमि नहीं कब्जाई है। नेपाल किसी अन्य देश के उकसाने पर गलत कर रहा है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कालापानी समझौता अंग्रेज हुकमरानों एवं तत्कालीन नेपाल नरेश के बीच हुआ था न कि भारत सरकार के साथ।
इन्होंने भी रखी अपनी राय
कालापानी सीमा विवाद नेपाल की आम जनता फैसला नहीं हो सकता है। क्योंकि दोनों देशों के आम लोग रोटी-बेटी के रिश्ते की अहमियत समझते हैं और मानते हैं। भारत के आत्म निर्भर भारत बनाने के संकल्प से तीसरा देश बौखला गया है और वह नहीं चाहता है कि भारत और नेपाल में मैत्री कायम रहे। यही वजह है कि चीन के उकसावे पर नेपाल की ओली सरकार भारत के साथ सदियों पुराने मधुर रिश्तों को खराब करने के काम में जुटी है।
दीप चंद्र पाठक, भाजपा जिलाध्यक्ष, चंपावत।
भारत के कालापानी क्षेत्र का अपना दिखाकर नेपाल का नया नक्शा जारी करने का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है। नेपाल ने ऐसे समय में विवाद को हवा दी है, जब पूरा विश्व कोरोना महामारी से लड़ रहा है। नेपाल सरकार ने राजनीति के लिए इस मुद्दे को हवा दी है। भारत का नेपाल के बीच हजारों किलोमीटर की खुली सीमा से पता चलता है कि नेपाल से रोटी-बेटी के रिश्ते सदियों पुराने हैं। लेकिन नेपाल की वर्तमान सरकार यह रिश्ते खत्म करने पर तुली हुई है, जिसे दोनों देश की जनता होने नहीं देगी।
हर्षवर्धन सिंह रावत, पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष, टनकपुर।
मेरा मानना है कि कालापानी के मुद्दे पर नेपाल की 90 प्रतिशत जनता सहमत नहीं होगी। इस विवाद पर नेपाल की ओर से उठाए जा रहे कदमों से भारत और नेपाल के रिश्ते बिगड़ सकते हैं। नेपाल हमारा बहुत अच्छा मित्र राष्ट्र है, लेकिन मौजूदा समय में उसके हर कदम को भारत सरकार ने गंभीरता से लेना चाहिए। नेपाल की हर हरकत पर नजर रखते हुए उनके अनुरूप कदम उठाने चाहिए।
रिटायर्ड कै. भानी चंद, अध्यक्ष गोरव सेनानी कल्याण समिति, टनकपुर-बनबसा।