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यहां कूड़ा खाने को मजबूर है एक बुजुर्ग
टीम डिजिटल / अमर उजाला, देहरादून
Updated Mon, 28 Apr 2014 05:06 PM IST
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उत्तराखंड के एनजीओ और तमात सामाजिक संस्थाएं जरूरतमंद लोगों की मदद करने का दम भरते हैं। लेकिन रुड़की में इस बुजुर्ग की मदद करने वाला कोई नहीं है।
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रुड़की के सिविल लाइंस साईं मंदिर के पास भक्तों के लिए कई तरह के भोग लोगों को निःशुल्क बंटता है। वहीं मंदिर के पास बने हुए कूड़ाघर से गंदगी बीनकर खाता एक बुजुर्ग अपना जीवन यापन कर रहा है।
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जिस जगह पर गंदगी और सड़ी दुर्गंध के कारण खड़ा रहना भी दुश्वार है, वहां वह एक गंदे से बिस्तर में दिन-रात पड़ा रहता है। न तो वह भिखारी है और न ही कोई पागल।
उसको न तो किसी ने कभी भीख मांगते देखा है और न ही किसी से बात करते पाया गया है। एक साल से भी अधिक समय से वह यहां है।
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सर्दी, गर्मी और मूसलाधार बारिश में भी वह निरीह उस गंदे कोने में छिपा हुआ अधिकांशतः लेटा रहता है। हां, रात के समय उसको अक्सर घूमते देखा जाता है।
न तो उसको कपकपाती सर्दी परेशान करती है, न ही झुलसाने वाली गर्मी और न ही डराने वाली बरसात। वह वहां बस एक पत्थर की मूर्ति की तरह स्थिर और मूक बना पड़ा रहता है।
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आसपास के लोग अक्सर कहते रहते हैं कि उसके पास मत जाना वह बहुत ही गन्दा है। लेकिन जिस हालत में वह जीवन यापन कर रहा है, उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि वह कोई पहुंचा हुआ अघोरी है।
क्योंकि इस प्रकार का रहन-सहन किसी कौलाचारी अथवा अघोरी का ही होता है। इसको देखकर अब से चार दशक पहले के बाबा पूरण सिंह की याद ताज़ा हो जाती है।
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वह भी पहले ऐसे ही सोलानी नदी के शमशान घाट के पास पड़े कूड़े में अपना जीवन यापन करते थे। और अपने समय के एक नामी और सिद्ध अघोरी माने गए थे।
दुःख की बात ये है कि भीड़-भाड़ वाले उस स्थान में इस बुजुर्ग की दुर्दशा पर किसी का भी ध्यान नहीं जाता। मानवता कहां है? शहर में इतने धनकुबेर हैं, एनजीओ हैं, धार्मिक संस्थाएं हैं, क्या किसी का भी ध्यान इस गरीब की दुर्दशा पर नहीं जाता?
कूड़े में से खाना बीनकर खाते लोग उसको देखते हैं, लकिन भंडारे में बटते खाने को लेकर कोई उसकी गंदगी को देखकर उसको देने उसके पास तक नहीं जाता। लोगों और प्रशासन की इस अनदेखी पर दुःख तो बहुत होता है, लेकिन शर्म भी आती है।
(यह खबर रुड़की के सिविल लाइंस एरिया में रहने वाले गोपाल राजू द्वारा अमर उजाला को भेजी गई है।)