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उत्तराखंड सरकार गठन को राज्य के खर्चे पर हुई केंद्र की पैरवी
संजय त्रिपाठी/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Fri, 03 Jun 2016 10:59 AM IST
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supreme court
- फोटो : file photo
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उत्तराखंड में सरकार गठन को लेकर पिछले अप्रैल और मई माह में विभिन्न न्यायालयों में लड़ी गई कानूनी लड़ाई में राज्य का बड़ा नुकसान हुआ।
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इस लड़ाई में यह भी पता नहीं चला कि कौन किसके लिए लड़ रहा है। जिन वकीलों ने कांग्रेस के खिलाफ न्यायालय में दलीलें दी, उन्हें 66 लाख का भुगतान भी राज्य को अपने कोष से करना पड़ा। किसी को अंदाजा भी नहीं होगा कि राजनीतिक अस्थिरता झेल रहे उत्तराखंड को केंद्र के नामी वकीलों का कर्जा भी चुकाना पड़ेगा।
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कांग्रेस के नौ बागी विधायकों की बगावत से अल्पमत में आई हरीश सरकार सत्ता से बाहर हो गई। राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। और इसके बाद शुरू हुआ कानूनी लड़ाई का दौर। उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक कांग्रेस, भाजपा व केंद्र ने अपने अपने दांव चले। हाईकोर्ट ने राष्ट्रपति शासन को असंवैधानिक बताते हुए राज्य सरकार को बहाल किया तो केंद्र ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे डाली।
आदेश पलटने के लिए अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगही समेत मशहूर वकीलों की फौज केंद्र की ओर से न्याय के मंदिरों में उतार दी गई। इधर, सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन को सशर्त हटाने के निर्देश देते हुए फ्लोर टेस्ट में हरीश रावत को बहुमत साबित करने को कहा। फ्लोर टेस्ट में सरकार ने बहुमत साबित कर दिया और हरीश रावत वापस मुख्यमंत्री बन गए।
उठापटक का यह पूरा एपीसोड कुल 54 दिन चला, जिसमें राजनीतिक अस्थिरता के चलते न केवल राज्य सरकार का बजट अटक गया। साथ ही उत्तराखंड के विकास की तमाम बड़ी परियोजनाओं को भी ठंडे बस्ते में जाना पड़ा। कुल मिलाकर उत्तराखंड को चौतरफा मार झेलनी पड़ी।
इधर सूत्रों के मुताबिक वकीलों की फीस के रूप में 66 लाख रुपए का भुगतान राजकोष से किया गया है। वैसे तो यह भुगतान नियमानुसार ठीक बताया जा रहा है। मगर फिर भी दबी जुबान में लोग यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि यह राज्य में हुए सियासी संकट का भुगतान है।

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