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वर्षों से चल रही गंगा बचाने की मुहिम
हरिद्वार/ ब्यूरो
Updated Fri, 28 Jun 2013 02:06 PM IST
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धर्मनगरी के मनीषियों ने 100 वर्ष पहले सोच लिया था कि एक समय ऐसा भी आएगा जब हिमालय, प्रकृति और गंगा प्रदूषित होने से नहीं बच पाएगी। उसी समय से इन्हें बचाने की मुहिम शुरू हुई। लेकिन यह और बात है कि न आज तक गंगा न प्रदूषित होने से बची और न पर्यावरण बच पाया।
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बनाए गए कानून कुछ समय बाद बेमानी हो गए। प्रकृति बचाने के लिए जिन कठोर निर्णयों की आवश्यकता है, वे कभी बड़े लोगों की भेंट चढ़े तो कभी जनतंत्र आड़े आया। गंगा पर बांध बनाने के खिलाफ विश्व का पहला बांध विरोधी आंदोलन वर्ष 1914 में हरिद्वार में शुरू हुआ था।
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महामना मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में पुरोहितों को साथ लेकर चलाए गए इस आंदोलन में एक समय ऐसा भी आया जब देश की 32 रियासतें अपनी सेनाओं के साथ गंगा और पर्यावरण बचाने के लिए बांध का विरोध करते हुए हरिद्वार में खड़ी हुई। नतीजा यह निकला कि गंगा की धारा पर बांध नहीं बन पाया और हरकी पैड़ी पर गंगा जल लाने के लिए अविच्छिन्न धारा छोड़कर नीलधारा पर बैराज बनाया गया।
गंगा को बचाने के लिए बने नियम
महामना के प्रयत्नों से तत्कालीन नगर पालिका ने गंगा और प्रकृति को बचाने के लिए बायलाज का निर्माण किया। इसमें 16 नियम गंगा बचाने के लिए रखे गए थे। गंगा में साबुन तक लगाकर स्नान करना मना था, जो आज भी कायम है। गंगा को मस्तक से लगाए बिना सीधे पैर डालकर स्नान करने की भी मनाही थी। इसी प्रकार पर्वत मालाओं को बचाने के लिए भी नियमों का सृजन किया गया।
वक्त की मार पड़ने के बाद ये नियम बेमानी हो गए। वोटों की राजनीति आड़े आते चली गई। 80 के दशक के बाद तो मानों सब कुछ खोता चला गया हो। जनतंत्र में जन को शक्तिशाली बनाने के लिए पर्यावरण, प्रकृति एवं गंगा के लिए बनाए गए तमाम नियमों को अधिकारियों एवं मंत्रियों ने भी ताक पर रख दिया। परिणाम यह कि चारों ओर पर्यावरणीय समस्याएं आ खड़ी हुई हैं।

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