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गृहिणी का सम्मान: सुप्रीम कोर्ट का फैसला रूढ़िवादी सोच पर एक कड़ा प्रहार
अमर उजाला
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sat, 13 Jun 2026 06:06 AM IST
विभिन्न अध्ययनों व सर्वेक्षणों से यह तथ्य सामने आ चुका है कि आमतौर पर महिलाएं पुरुषों की तुलना में कई गुना अधिक समय घरेलू देखरेख में लगाती हैं। इसके बावजूद, राष्ट्रीय आय और उत्पादकता के पारंपरिक पैमानों में उनके योगदान का समुचित प्रतिबिंब नहीं दिखाई देता। जाहिर है कि यह स्थिति न केवल आर्थिक असमानता को बढ़ाने वाली है, बल्कि महिलाओं की भूमिका के सामाजिक अवमूल्यन को भी जन्म देती है।
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भारतीय समाज में गृहिणियों को हमेशा से परिवार की धुरी तो कहा जाता रहा है, लेकिन घर के अनगिनत कार्यों में अपना पूरा जीवन खपा देने वाली महिलाओं के योगदान को आर्थिक विमर्श से बाहर ही रखा गया है। इस संदर्भ में, सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाली गृहिणियों के मुआवजे को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला महत्वपूर्ण तो है ही, यह उस रूढ़िवादी सोच पर भी एक कड़ा प्रहार है, जो महिलाओं के अथक और अवैतनिक श्रम को अनुत्पादक मानती आई है। गौरतलब है कि गृहिणी बच्चों के व्यक्तित्व का निर्माण करती है, उनकी शिक्षा व संस्कारों की नींव रखती है और समाज के लिए नई पीढ़ी तैयार करती है। इस दृष्टि से देखें, तो उसके घरेलू श्रम का असर पूरे राष्ट्र पर पड़ता है। इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में शीर्ष अदालत ने भी माना है कि घर की देखरेख करने वाली महिलाएं सिर्फ घर की नहीं, बल्कि राष्ट्र की भी निर्माता होती हैं। अदालत ने अपने फैसले में गृहिणियों के कार्य का न्यूनतम अनुमानित मूल्य तीस हजार रुपये प्रतिमाह निर्धारित करते हुए यह स्पष्ट किया है कि घरेलू कामकाज को केवल भावनात्मक या नैतिक जिम्मेदारी के रूप में नहीं देखा जा सकता। ये वे कार्य होते हैं, जिनके बगैर परिवार की इकाई टिक ही नहीं सकती। विडंबना यह है कि अगर यही सेवाएं बाजार से ली जाएं, तो उनकी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ती है, पर जब इन्हें कोई महिला अपने घर के भीतर करती है, तो उन्हें ‘काम’ की श्रेणी तक में नहीं रखा जाता। विभिन्न अध्ययनों व सर्वेक्षणों से यह तथ्य सामने आ चुका है कि आमतौर पर महिलाएं पुरुषों की तुलना में कई गुना अधिक समय घरेलू देखरेख में लगाती हैं। इसके बावजूद, राष्ट्रीय आय और उत्पादकता के पारंपरिक पैमानों में उनके योगदान का समुचित प्रतिबिंब नहीं दिखाई देता। जाहिर है कि यह स्थिति न केवल आर्थिक असमानता को बढ़ाने वाली है, बल्कि महिलाओं की भूमिका के सामाजिक अवमूल्यन को भी जन्म देती है। इस संदर्भ में शीर्ष अदालत का यह कहना आंखें खोलने वाला है कि महिलाओं के घरेलू कार्यों का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में करीब 17 फीसदी हिस्सा होता है। हालांकि, तीस हजार रुपये प्रतिमाह का आकलन किसी गृहिणी के वास्तविक योगदान का मूल्य नहीं हो सकता, फिर भी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला घरेलू श्रम को सम्मान व पहचान दिलाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह फैसला मुआवजे के निर्धारण तक सीमित न रहकर, समाज में महिलाओं की भूमिका के प्रति सम्मान व संवेदनशीलता बढ़ाने का माध्यम भी बनेगा।
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