धर्मनिरपेक्षता के छद्म पहरुये
देश को विकास के बड़े-बड़े सपने दिखा रहे नरेंद्र मोदी के प्रति मध्यवर्ग के एक बड़े तबके की गहरी आसक्ति इस बात का प्रमाण है कि फिलहाल धर्मनिरपेक्षता केंद्रीय मुद्दा नहीं है। धर्मनिरपेक्षता की यह पराजय अचानक नहीं हुई है। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के बहाने देश को नफरत की आग में झोंकने वाली सांप्रदायिक शक्तियों के अनवरत षड्यंत्रों की तार्किक परिणति है मौजूदा सियासी परिदृश्य। इसके लिए अगर सांप्रदायिक शक्तियां जिम्मेदार हैं, तो उससे ज्यादा वे लोग, जो धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़कर सांप्रदायिक शक्तियों के हाथों में खेलते रहे। इन लोगों के लिए धर्मनिरपेक्षता चुनाव जीतने का एक रणनीतिक हथियार भर रही। ऐसा एक या दो दल ने नहीं, लगभग सभी दलों ने किया।
मुसलमानों को सांप्रदायिक शक्तियों का डर दिखाकर उन्हें अपने बाड़े में बंद रखने के लिए ये लोग धर्मनिरपेक्षता का राग अलापते रहे। धर्मनिरपेक्षता के इन छद्म पहरुओं में कांग्रेस का नाम सर्वप्रथम लिया जाना चाहिए। मुस्लिम वोटों का संतुलन साधने के लिए कांग्रेस कभी मुस्लिम लीग जैसे कट्टरपंथी दलों के साथ दोस्ती गांठती रही, तो कभी नरम हिंदुत्व की लाइन अख्तियार कर हिंदू कट्टरपंथियों को संतुष्ट करने का प्रयास करती रही। कांग्रेस की यह रणनीति राजीव गांधी के शासन काल में तब पूरी तरह बेनकाब हो गई, जब उन्होंने एक ओर शाहबानो केस में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला पलटकर मुसलमानों को रिझाने की कोशिश की, दूसरी ओर विवादित ढांचे का ताला खोलकर हिंदुओं को संतुष्ट करने का प्रयास किया। फिर भी उन्हें न माया मिली, न राम। तब से आज तक यह पार्टी माया और राम के द्वंद्व में उलझी है।
मुलायम सिंह खुद को धर्मनिरपेक्षता का बड़ा झंडाबरदार बताते हैं। लेकिन सच यह है कि वह आज भी 1990 में कारसेवकों के प्रति दिखाई गई सख्ती की कमाई खा रहे हैं। उसके बाद कई मौके पर उनकी निष्ठा संदेह के दायरे में आई। उन पर न केवल अपनी सरकार बचाने के लिए भाजपा से साठगांठ के आरोप लगे, बल्कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से आडवाणी की प्रशंसा कर अपनी भावी रणनीति का संकेत देने में भी गुरेज नहीं किया। नीतीश कुमार भी आज धर्मनिरपेक्षता के लिए कोई भी कुर्बानी देने का दावा कर रहे हैं। लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि यही नीतीश कुमार पिछले 17 वर्षों से भाजपा के हमप्याला-हमनिवाला बने हुए थे। गजब यह भी है कि नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी तो सांप्रदायिक लगते हैं, लेकिन रथयात्रा निकालकर पूरे देश का वातावरण विषाक्त करने वाले आडवाणी से उन्हें कोई परहेज नहीं। भाजपा ने अगर मोदी के बजाय आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया होता, तो यही नीतीश कुमार उनकी विरुदावली गाते नजर आते।
एक से अधिक बार भाजपा के सहयोग से उत्तर प्रदेश में सरकार चला चुकी मायावती के संदर्भ में तो कुछ भी कहना निरर्थक है। इसके बावजूद उन्हें अपने दलित एजेंडे के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता। बीजू जनता दल के नवीन पटनायक, अन्नाद्रमुक की जयललिता और द्रमुक के करुणानिधि जैसे नेताओं का इतिहास भी यही बताता है कि वे कुर्सी के लिए हर मूल्य और सिद्धांत को तिलांजलि दे सकते हैं। वामपंथी वैसे तो सांप्रदायिक सौहार्द्र की बातें कम बढ़-चढ़कर नहीं करते। माकपा ने पिछले दिनों दिल्ली में एक सम्मेलन करके अपनी साख पर नए सिरे से शान चढ़ाने की कोशिश की। लेकिन व्यावहारिक धरातल पर इसका दृष्टिकोण भी औरों से भिन्न नहीं रहा है। ऐसे कई मौके आए, जब केरल और पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकारों ने सांप्रदायिक ताकतों के आगे घुटने टेक दिए। मुस्लिम कट्टरपंथियों को संतुष्ट करने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने दुनिया भर से दुत्कारी जा रही तस्लीमा नसरीन को अपने राज्य में शरण देने से इनकार कर दिया था।
देश भर में अगर आज माहौल विषाक्त है, सांप्रदायिकता तेजी से विस्तार ले रही है, तो इसके लिए धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वाले ये अवसरवादी नेता ही पहले जिम्मेदार हैं। कुर्सी के चक्कर में ये भूल जाते हैं कि धर्मनिरपेक्षता सिर्फ भाषण देने का विषय नहीं है। यह जीवन मूल्य है, जिसे जीना पड़ता है।