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मुद्दा: केवल पेड़ लगा देना ही काफी नहीं, पर्यावरण दिवस की रस्म से आगे बढ़ना जरूरी

Raj Shekhar Pant राजशेखर पंत,
Updated Fri, 05 Jun 2026 06:47 AM IST
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आज पर्यावरण दिवस के दिन सोशल मीडिया पर पेड़ लगाने की तस्वीरें ही साझा न करें, आत्मनिरीक्षण भी करें कि आप पर्यावरण संरक्षण के प्रति कितने संवेदनशील हैं।
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Planting trees isn't enough; it's important to move beyond the ritual of Environment Day
सिर्फ पेड़ लगा देना ही काफी नहीं - फोटो : Freepik

विस्तार

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। आज लोग वृक्षारोपण करते हुए अपनी तस्वीरें फेसबुक पर साझा करते हैं। अच्छी बात है। ऐसी तस्वीरें देखकर प्रेरणा भी मिलती है और मन करता है कि हम भी एक पौधा लगाएं। लेकिन आज का दिन आत्मनिरीक्षण का भी है कि हम पर्यावरण संरक्षण और उससे जुड़े मुद्दों के प्रति कितने संवेदनशील व जागरूक हैं। पर्यावरण मात्र पेड़ या जंगल नहीं है, और महज पेड़ लगा लेने भर से कोई पर्यावरण-प्रेमी नहीं हो जाता। पेड़ों के अलावा भी बहुत कुछ है, जो पर्यावरण से सीधे तौर पर जुड़ा है। हमारी जीवन-शैली कितने कार्बन उत्सर्जन के लिए उत्तरदायी है? हम पानी का उपयोग कैसे कर रहे हैं? कूड़े के निस्तारण के प्रति हमारा नजरिया क्या है? हम क्या खाते हैं, क्या खरीदते हैं? नया घर बनाते समय हम कौन-सी निर्माण सामग्री उपयोग में ला रहे हैं? अपनी गाड़ी का इस्तेमाल हम कितना और कैसे कर रहे हैं?- ये सब पर्यावरण से जुड़े प्रश्न हैं। स्पष्ट है कि हमारी जीवन-शैली और हमारी सोच ही हमारे पर्यावरण-प्रेमी होने का वास्तविक पैमाना है।


कुछ वर्ष पूर्व सीबीएसई द्वारा ‘एनवायरमेंट स्टडीज’ को प्लस-टू स्तर पर एक अनिवार्य विषय के रूप में पाठ्यक्रम से जोड़ा गया था। यह पहल नई पीढ़ी को पर्यावरण के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनाने का बहुत अच्छा माध्यम बन सकती थी। पर इस विषय में केवल उत्तीर्ण हो जाना ही पर्याप्त था। कुछ वर्षों बाद इस विषय को पाठ्यक्रम से हटा ही दिया गया। यह पूरा प्रकरण पर्यावरण के प्रति हमारे तथाकथित शिक्षाविदों, सरकार और स्वयं हमारी सोच की गंभीरता पर एक सशक्त टिप्पणी है।


लालच के बाद, नीतिगत, प्रशासनिक और निजी स्तर पर समस्याओं का तत्काल समाधान ढूंढने की हमारी जल्दबाजी ने पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। पानी की दिक्कत हुई, तो हमने बोरवेल खोद डाले। कीड़े-मकोड़ों को नियंत्रित करने के लिए पेस्टिसाइड्स और खरपतवारों से छुटकारा पाने के लिए हर्बीसाइड्स छिड़क दिए। पर्यटन बढ़ाने की बात हुई, तो पहाड़ की चोटी तक सड़क खोद डाली। सांप जैसा कोई जीव पसंद नहीं आया, तो उसे मार डाला। समस्या की जड़ तक जाने की जरूरत ही हमने कभी महसूस नहीं की। अपने आसपास की जमीन और उससे जुड़ी चीजों के साथ सीधा संवाद स्थापित करने का प्रयास शायद ही हमने कभी किया हो। आज हम टिड्डियों के कहर, बेमौसम बरसात, फ्लैश फ्लड, भूस्खलन को ‘दैवीय आपदा’ मानते हैं, पर ये सब हमारी ही खड़ी की हुई समस्याएं हैं। ये प्रकृति के साथ हमारे खोखले होते जा रहे रिश्तों के परिणाम हैं।

हमारी पिछली पीढ़ी के अधिकांश लोगों को ‘पर्यावरण’ का अर्थ भी मालूम नहीं होगा, पर उनके पास पर्यावरणीय संवेदनशीलता की एक सरल समझ थी। मेरे जीवन की सबसे बड़ी पर्यावरणविद् मेरी आमा (दादी) ने मुझे बताया था कि हरे पेड़ नहीं काटने चाहिए; पेड़ पर आए फलों पर पहला अधिकार चिड़ियों का होता है; खाना बर्बाद नहीं करना चाहिए; शाम के बाद पेड़-पौधों से कुछ नहीं तोड़ना चाहिए, क्योंकि उन्हें भी नींद आती है। चींटियों को आटा खिलाना चाहिए। मछलियों को चारा देना चाहिए। आमा के इस सहज ज्ञान को हमारी माता-पिता वाली पीढ़ी ने भी जिया था। शायद इसी वजह से हमारे घर में और उसके चारों ओर फैले बगीचे में फल-फूलों, चिड़ियों, तितलियों, सांपों, मेंढकों और असंख्य छोटे-बड़े जीवों का अपना एक संसार है।
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