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मुद्दा: कचरा प्रबंधन आपकी भी है जिम्मेदारी, अदालत कब तक करेगी पहरेदारी
विवेक एस अग्रवाल
Published by: Pavan
Updated Mon, 01 Jun 2026 08:04 AM IST
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कचरा प्रबंधन पर सर्वोच्च न्यायालय के कठोर निर्णय व्यवस्था को बदलेंगे या ढाक के तीन पात बने रहे जाएंगे, यह विचारणीय है। प्रभावी कचरा प्रबंधन हेतु संपूर्ण प्रसंस्करण हासिल करने के लिए भारत के कुछ राज्यों में अपनाई जा रही पद्धति के अनुरूप स्पेशल पर्पस व्हीकल कंपनी गठित करने का निर्देश दिया गया है।
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कचरा प्रबंधन आपकी भी जिम्मेदारी है
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अमर उजाला ग्राफिक्स
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बिल जमा करने के बावजूद यदि आपकी इमारत या वाणिज्यिक प्रतिष्ठान का पानी-बिजली का कनेक्शन काटने की नौबत आ जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं! यह आपको जागृत करने के लिए है कि जीने का अधिकार पाने के साथ आपके द्वारा उत्पादित कचरे को सही ठिकाने लगाना भी आपका उत्तरदायित्व है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने भोपाल नगर निगम की एक अपील पर निर्णय देते हुए उक्त आदेश पारित किए हैं।वर्ष 2000 से लेकर 2026 तक तीन बार कचरा प्रबंधन संबंधी नियम बनाए या संशोधित किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। यही कारण है कि कचरा प्रबंधन को सुदृढ़ एवं जवाबदेह बनाने हेतु हर स्तर पर जिम्मेदारी तय की गई है। ऐसा नहीं है कि यह मसला नया हो, वर्ष 2013 में भूजल प्रदूषण की समस्या को लेकर शुरू हुआ प्रकरण नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल से होकर शीर्ष अदालत तक न्याय की गुहार करते हुए पहुंचा है। उम्मीद है, इस बार पारित निर्णय हर बार की तरह महज दिखावा या औपचारिकता बनकर नहीं रहेंगे।
उक्त आदेश के तहत अन्य संबंधित अधिकारियों एवं शासन के विभिन्न निकायों के साथ मुख्य रूप से जिला कलेक्टर को एक वर्ष के लिए निर्णायक शक्तियां देते हुए कचरा संबंधी विभिन्न अवयवों एवं परिस्थितियों पर कार्यवाही सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है। पहले भी जिला स्तर पर क्रियान्वयन की जिम्मेदारी कलेक्टर के पास हुआ करती थी, लेकिन पहली बार उन्हें पर्यावरण प्रतिरक्षण अधिनियम की धारा-पांच के तहत बाध्यकारी आदेश पारित करने हेतु प्राधिकृत किया गया है। उक्त शक्तियों के साथ जिम्मेदारी से बचने की कोई गुंजाइश नहीं है। यही नहीं, उच्चतम न्यायालय ने कचरे की समस्या हल करने हेतु कलेक्टर द्वारा पारित किसी भी निर्देश को न्यायालय के आदेशों के समकक्ष दर्जा दिया है। कचरे का संग्रहण, परिवहन और निस्तारण तो वैज्ञानिक पद्धति से हो ही, लैंडफिल की स्थिति को भी उचित अभियांत्रिकी के साथ विकसित एवं संचालित करवाने के लिए स्थल का नियमित दौरा सुनिश्चित किया गया है। यह भी कलेक्टर की ही जिम्मेदारी होगी कि शहर व गांवों में अवैध रूप से कचरा नहीं डाला जाए। उस बाबत किसी भी प्रकार की शिथिलता की अनुमति नहीं होगी।
उच्चतम न्यायालय ने 25 मई को सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय स्तर पर कचरा प्रबंधन संबंधी क्रियान्वयन की निगरानी हेतु वरिष्ठ अधिकारियों की कमेटी गठित करने के भी आदेश दिए हैं। कचरा प्रबंधन विशेषज्ञों एवं उद्योग प्रतिनिधियों के बिना मात्र अधिकारियों की कमेटी कितनी सार्थक निगरानी कर पाएगी, यह भविष्य के गर्भ में है। जिले में विशेष प्रकोष्ठ गठित कर कचरा प्रबंधन क्रियान्वयन के साथ उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध आवश्यक दंडात्मक कार्यवाहियों को भी अंजाम दिया जाना है। शहरी निकायों द्वारा कचरा प्रबंधन में वित्तीय उपलब्धता का बहाना बनाया जाता है। इस संदर्भ में स्थानीय निकायों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने बजट का न्यूनतम 30 प्रतिशत कचरा प्रबंधन पर व्यय करेंगे। राह चलते व्यक्ति द्वारा कचरा फेंके जाने की समस्या से निपटने के लिए मोबाइल कोर्ट स्थापित करने की अनुशंसा की गई है, ताकि उक्त व्यक्ति को मौके पर ही दंडित किया जा सके। साथ ही बाजारों को सिंगल यूज प्लास्टिक मुक्त घोषित करते हुए अतिरिक्त साधनों के साथ दिन में दो बार स्वच्छ करवाए जाने का भी निर्देश दिया गया है। प्रभावी कचरा प्रबंधन हेतु संपूर्ण प्रसंस्करण हासिल करने के लिए भारत के कुछ राज्यों में अपनाई जा रही पद्धति के अनुरूप स्पेशल पर्पस व्हीकल कंपनी गठित करने का निर्देश दिया गया है।
हालांकि न्यायालय के आदेश में भारी मात्रा में कचरा उत्पादन करने वाले स्थलों पर नियंत्रण एवं कार्यवाही हेतु विशेष निर्देश प्रदान किए हैं, लेकिन सार्वजनिक स्थलों पर खुले कचरा डिपो को खत्म करने को भी महत्वपूर्ण माना गया है। हालांकि कचरे के खुले वाहनों में परिवहन को नियम विरुद्ध ठहराया गया है, किंतु अधिकांश निकायों द्वारा ट्रैक्टर ट्राली में कूड़ा परिवहन किया जाता है। अब देखना यह है कि न्यायालय के आदेश के मुताबिक क्रियान्वयन सुनिश्चित होगा या स्थानीय निकाय पुराने ढर्रे पर ही चलेंगे। उचित होगा कि प्रशासन अपरिमित शक्तियां मिलने के बावजूद निरंकुश न होकर सकारात्मक कदम उठाए। यदि तय सीमा में कचरे का यथारूप प्रबंधन हो जाता है, तो नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीने के अधिकार के साथ स्वच्छ वातावरण, स्वच्छता और बीमारियों से बचाव का अधिकार भी स्वतः प्राप्त हो जाएगा।