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आशा और मोहभंग के बीच: सिर्फ आक्रोश से नहीं बनती बात, परिवर्तनकारी क्रांति के लिए जरूरी हैं कुछ मूल्य

Harbansh Dixit हरबंश दीक्षित
Updated Fri, 05 Jun 2026 06:39 AM IST
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केवल विरोध, आक्रोश और असंतोष किसी राष्ट्र का भविष्य नहीं गढ़ सकते। राष्ट्र का निर्माण नीतियों, संस्थाओं, अनुशासन और उत्तरदायित्व से होता है। इतिहास साक्षी है कि जब परिवर्तन इन मूल्यों का स्वरूप ग्रहण नहीं कर पाता, तब वही क्रांति, जो कभी आशा का प्रतीक थी, धीरे-धीरे मोहभंग का कारण बन जाती है।
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Between hope and disillusionment: Anger alone is not enough; transformative revolution requires certain values
सिर्फ आक्रोश से बात नहीं बनती - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

नेपाल के प्रधानमंत्री के हालिया बयान ने न केवल भारत-नेपाल सीमा विवाद को चर्चा का विषय बना दिया है, बल्कि इसने तथाकथित जनरेशन जेड या जेन-जी की राजनीतिक परिपक्वता और शासन-दृष्टि पर भी व्यापक विमर्श को जन्म दिया है। प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने नेपाली संसद में कहा कि सिर्फ भारत ने ही नेपाल की भूमि पर अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी कुछ स्थानों पर भारतीय भूमि पर कब्जा किया हुआ है। इस बयान के बाद नेपाल के भीतर ही तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं और बाद में नेपाल के विदेश मंत्रालय को स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा।


सवाल केवल नेपाल तक सीमित नहीं है। बांग्लादेश, केन्या, सर्बिया, इंडोनेशिया और विश्व के अनेक देशों में उभरते जेन-जी आंदोलन इसी प्रश्न को नए संदर्भों में सामने ला रहे हैं। आंदोलन का काम व्यवस्था की कमियों को उजागर करना है। वह प्रश्न पूछता है, चुनौती देता है और परिवर्तन की मांग करता है। किंतु शासन का कार्य कहीं अधिक जटिल होता है। उसे केवल समस्याओं की पहचान नहीं करनी होती, बल्कि उनके व्यावहारिक समाधान भी प्रस्तुत करने होते हैं। उसे आदर्श और यथार्थ, आकांक्षा और संसाधन, परिवर्तन और स्थिरता के बीच संतुलन स्थापित करना पड़ता है। यही कारण है कि इतिहास में अनेक क्रांतियां सफल हुईं, परंतु उनके बाद की व्यवस्थाएं अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सकीं।


नेपाल का अनुभव इसी की पुनर्पुष्टि करता है। जिस युवा ऊर्जा ने स्थापित राजनीतिक संरचनाओं को चुनौती दी, सत्ता में आने के बाद वही ऊर्जा प्रशासनिक जटिलताओं, आर्थिक सीमाओं और संस्थागत बाधाओं से टकराने लगी। यह किसी व्यक्ति या दल की विफलता का प्रश्न नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक शासन की स्वाभाविक चुनौती है। आंदोलन की भाषा भावनाओं की होती है, जबकि शासन की भाषा प्रक्रियाओं, नीतियों और उत्तरदायित्व की होती है। दोनों के बीच की दूरी को पाटना किसी भी नए नेतृत्व के लिए सबसे कठिन परीक्षा होती है। 'जेन-जी' आंदोलनों की विशेषता उनका डिजिटल स्वरूप है। सोशल मीडिया ने इस पीढ़ी को अभूतपूर्व शक्ति प्रदान की है। अब राजनीतिक लामबंदी के लिए पारंपरिक संगठनात्मक ढांचे की जरूरत नहीं रही। एक वीडियो, एक पोस्ट या एक अभियान लाखों लोगों को प्रभावित कर सकता है। इससे लोकतंत्र में सहभागिता बढ़ी है और सत्ता की जवाबदेही भी सुदृढ़ हुई है। किंतु डिजिटल शक्ति के साथ एक अंतर्निहित जोखिम भी जुड़ा हुआ है। सोशल मीडिया तत्काल प्रतिक्रिया को महत्व देता है, जबकि शासन दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखकर निर्णय लेने की अपेक्षा करता है। लोकतंत्र में जनसमर्थन आवश्यक है, परंतु केवल जनसमर्थन पर्याप्त नहीं है। उसे संस्थागत क्षमता, नीति-दृष्टि और प्रशासनिक परिपक्वता का भी सहारा चाहिए। लोकतंत्र की शक्ति परिवर्तन में निहित है। जो व्यवस्था समयानुकूल परिवर्तन की क्षमता खो देती है, वह स्वयं को सुरक्षित व प्रासंगिक बनाए रखने की शक्ति भी खो बैठती है। इतिहास गवाह है कि समाज तब आगे बढ़ते हैं, जब वे अपनी त्रुटियों को पहचानने और स्वयं को बदलने का साहस रखते हैं। इस दृष्टि से देखें, तो जेन-जी आंदोलनों ने लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को चेतावनी दी है। उन्होंने स्मरण कराया है कि जनाकांक्षाओं की अनदेखी अंततः संकट का कारण बनती है।

किंतु दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। परिवर्तन का वास्तविक मूल्य उसके उद्घोष में नहीं, बल्कि उसके संस्थागत रूपांतरण में निहित होता है। केवल विरोध, आक्रोश और असंतोष किसी राष्ट्र का भविष्य नहीं गढ़ सकते। राष्ट्र का निर्माण नीतियों, संस्थाओं, अनुशासन और उत्तरदायित्व से होता है। इतिहास साक्षी है कि जब परिवर्तन इन मूल्यों का स्वरूप ग्रहण नहीं कर पाता, तब वही क्रांति, जो कभी आशा का प्रतीक थी, धीरे-धीरे मोहभंग का कारण बन जाती है।

फ्रांसीसी क्रांति से लेकर अरब स्प्रिंग तक अनेक उदाहरण इस सत्य की पुष्टि करते हैं। परिवर्तन की ऊर्जा जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उस ऊर्जा को रचनात्मक दिशा देने की क्षमता है।
आज 'जेन-जी' आंदोलनों के समक्ष भी यही चुनौती है। यदि वे केवल व्यवस्था-विरोध तक सीमित रहते हैं, तो उनका प्रभाव क्षणिक रहेगा। किंतु यदि वे संस्थागत निर्माण, नीतिगत परिपक्वता, प्रशासनिक उत्तरदायित्व और लोकतांत्रिक संस्कृति के संवर्धन की दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो वे 21वीं शताब्दी की राजनीति को नई दिशा दे सकते हैं।

युवावाद का एक अंतर्निहित आकर्षण यह है कि वह नवीनता, साहस और परिवर्तन की आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करता है। किंतु राजनीति केवल उत्साह से नहीं चलती। शासन के लिए अनुभव, धैर्य और संतुलन की भी आवश्यकता होती है। किसी भी राष्ट्र का भविष्य तब अधिक सुरक्षित होता है, जब युवा ऊर्जा और अनुभवी विवेक परस्पर प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहयोगी बनते हैं। लोकतंत्र की सफलता पीढ़ियों के संघर्ष में नहीं, बल्कि पीढ़ियों के संवाद में निहित होती है।

अंततः किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात से निर्धारित होती है कि उसने शासन की गुणवत्ता में कितना सुधार किया। इतिहास सत्ता परिवर्तन को कुछ समय तक याद रखता है, किंतु स्थायी सम्मान उन आंदोलनों को देता है, जो शासन संस्कृति को बदल देते हैं।

'जेन-जी' आंदोलनों के समक्ष भी यही कसौटी है। यदि वे केवल असंतोष की अभिव्यक्ति बनकर रह जाते हैं, तो उनका प्रभाव सीमित रहेगा। किंतु यदि वे लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक उत्तरदायी, शासन को अधिक पारदर्शी और राजनीति को अधिक जनोन्मुख बनाने में सफल होते हैं, तो वे 21वीं शताब्दी की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ सिद्ध होंगे।

यही प्रश्न नेपाल और बांग्लादेश के सामने है, और वस्तुतः यही प्रश्न 21वीं शताब्दी के अन्य लोकतंत्रों के सामने भी है। क्रांति इतिहास का आरंभ हो सकती है, परंतु इतिहास का निर्माण सदैव सुशासन ही करता है। आंदोलन व्यवस्था बदल सकते हैं, परंतु राष्ट्रों का निर्माण केवल आंदोलनों से नहीं होता। राष्ट्रों का निर्माण दूरदर्शी नेतृत्व, संतुलित निर्णय और उत्तरदायी शासन से होता है। इतिहास अंततः उसी का मूल्यांकन करता है, जिसने राष्ट्र को सबसे स्थायी दिशा दी। यही वह कसौटी है, जिस पर किसी भी पीढ़ी की वास्तविक परीक्षा होती है।  - edit@amarujala.com
 
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