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पर्यावरण दिवस विशेष: प्रकृति को बचाना केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं, हमें भी अपने कर्तव्य निभाने होंगे
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हम अक्सर पर्यावरण पर चर्चा करते समय अमेजन के जंगलों, पिघलते ग्लेशियरों और समुद्र के बढ़ते जलस्तर की बात करते हैं, लेकिन क्या हमने कभी अपने आसपास झांककर देखा है? क्या हमने गौर किया है कि हमारे शहरों में गर्मी पहले से अधिक क्यों महसूस होती है?
विश्व पर्यावरण दिवस।
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
सुबह जब हम अपने घर का दरवाजा खोलते हैं तो शायद ही कभी यह सोचते हों कि हमारे दिन की शुरुआत प्रकृति के साथ एक नए रिश्ते से हो रही है। हम नल खोलते हैं। चाय बनाते हैं। अखबार पढ़ते हैं। वाहन स्टार्ट करते हैं और अपने काम में लग जाते हैं।
यह सब इतना सामान्य लगता है कि हम इसके पर्यावरणीय प्रभावों के बारे में सोचते ही नहीं, लेकिन क्या सचमुच पर्यावरण संकट केवल बड़े उद्योगों, सरकारों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का विषय है? क्या एक आम आदमी की आदतों का इस संकट से कोई संबंध नहीं?
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आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, जल संकट, प्रदूषण और जैव विविधता के विनाश जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब यह सवाल पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि आखिर जिम्मेदार कौन है? क्या केवल सरकारें? क्या केवल उद्योग? या फिर हम सब? पर्यावरण दिवस पर इस पर एकबार पुनः विचार करने की आवश्यकता है।
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हम अक्सर पर्यावरण पर चर्चा करते समय अमेजन के जंगलों, पिघलते ग्लेशियरों और समुद्र के बढ़ते जलस्तर की बात करते हैं, लेकिन क्या हमने कभी अपने आसपास झांककर देखा है? क्या हमने गौर किया है कि हमारे शहरों में गर्मी पहले से अधिक क्यों महसूस होती है? क्यों हर साल पानी की समस्या बढ़ती जा रही है? क्यों बच्चों को खुले मैदान और छायादार पेड़ कम दिखाई देते हैं? सबसे बड़ा सवाल, क्या हम अपने बच्चों के लिए वही धरती छोड़ पाएंगे, जो हमें अपने पूर्वजों से मिली थी?
सच्चाई यह है कि पर्यावरण का संकट अचानक नहीं आया। यह हमारी छोटी-छोटी लापरवाहियों का वर्षों से जमा होता हुआ परिणाम है। जिस तरह बूंद-बूंद से घड़ा भरता है, उसी तरह हमारी रोजमर्रा की आदतें मिलकर एक बड़े संकट को जन्म देती हैं, लेकिन यदि समस्या हमारी आदतों से पैदा हुई है तो समाधान भी हमारी आदतों में ही छिपा है।
जब भी पर्यावरण की बात होती है तो हम अक्सर सरकारों को दोष देने लगते हैं। यह सच है कि नीतियां बनाना और उनका पालन करवाना सरकार का दायित्व है, लेकिन क्या सरकार हमारे घर का नल बंद कर सकती है? क्या सरकार हमें प्लास्टिक का उपयोग न करने के लिए मजबूर कर सकती है?
क्या कोई कानून हमें भोजन की बर्बादी से रोक सकता है यदि हम स्वयं जागरूक न हों? सच यह है कि पर्यावरण संरक्षण की सबसे बड़ी ताकत आम नागरिक के हाथ में है। एक व्यक्ति का छोटा कदम शायद मामूली लगे, लेकिन जब करोड़ों लोग वही कदम उठाते हैं तो उसका प्रभाव असाधारण हो जाता है। दस कर्तव्य निभाकर हम अपना योगदान दे सकते हैं...
पहला कर्तव्य : प्लास्टिक से दूरी
क्या हमने कभी सोचा है कि बाजार से लाई गई एक प्लास्टिक की थैली आखिर जाती कहां है? हम उसे कुछ मिनट उपयोग करते हैं और फिर फेंक देते हैं, लेकिन वह सैकड़ों वर्षों तक मिट्टी और जल स्रोतों को प्रदूषित करती रहती है। यदि हर व्यक्ति अपने साथ कपड़े का थैला लेकर निकलना शुरू कर दे तो क्या लाखों टन प्लास्टिक कचरे को कम नहीं किया जा सकता? यह बदलाव कठिन नहीं है, केवल आदत बदलने की जरूरत है।
दूसरा कर्तव्य : पानी को संसाधन नहीं, जीवन समझना
आज भी अधिकांश लोग नल खुला छोड़कर दांत साफ करते हैं, गाड़ियों को पाइप से धोते हैं और पानी की बर्बादी को सामान्य मानते हैं, लेकिन क्या हम जानते हैं कि दुनिया के कई शहर गंभीर जल संकट की ओर बढ़ रहे हैं?
कल्पना कीजिए कि जिस पानी को हम आज लापरवाही से बहा रहे हैं, उसी पानी के लिए कल हमारी अगली पीढ़ी संघर्ष करे। क्या हम ऐसी स्थिति चाहते हैं? पानी बचाना केवल आर्थिक नहीं, नैतिक जिम्मेदारी भी है।
तीसरा कर्तव्य : केवल पौधे लगाना नहीं, उन्हें बचाना
हर साल लाखों पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन उनमें से कितने जीवित बचते हैं? पेड़ लगाना फैशन बन गया है, लेकिन क्या हम उनकी देखभाल भी करते हैं? किसी पौधे को लगाकर उसकी जिम्मेदारी लेना पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक रूप है। एक बड़ा पेड़ केवल छाया नहीं देता, वह हवा को स्वच्छ करता है, तापमान नियंत्रित करता है और असंख्य जीवों को आश्रय देता है।
चौथा कर्तव्य : ऊर्जा बचाना
क्या हमने कभी सोचा है कि बेवजह जलता एक बल्ब या चलता हुआ एसी केवल बिजली नहीं खर्च करता, बल्कि उसके पीछे कोयले का दहन, प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन भी जुड़ा होता है? जब हम कमरे से निकलते समय बिजली बंद करते हैं, तब हम केवल अपना बिजली बिल नहीं बचाते, बल्कि पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव को भी कम करते हैं।
पांचवां कर्तव्य : कचरे को जिम्मेदारी से संभालना
हम अपने घरों को साफ रखते हैं, लेकिन क्या शहर भी हमारा घर नहीं है? गीले और सूखे कचरे को अलग करना एक साधारण काम लगता है, लेकिन यही कदम कचरा प्रबंधन की पूरी प्रक्रिया को बदल सकता है। यदि हर घर यह जिम्मेदारी निभाए तो शहरों के बाहर बढ़ते कचरे के पहाड़ों को काफी हद तक रोका जा सकता है।
छठा कर्तव्य : कागज बचाना
डिजिटल युग में भी हम अनावश्यक प्रिंट निकालते हैं, रसीदें लेते हैं और कागज़ का अत्यधिक उपयोग करते हैं। क्या हमने कभी सोचा कि एक कॉपी या किताब के पीछे कितने पेड़ों की कहानी छिपी होती है? इसका अर्थ यह नहीं कि कागज का उपयोग बंद कर दिया जाए, बल्कि उसका विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए।
सातवां और आठवां कर्तव्य : परिवहन की आदतें बदलना
क्या हर छोटी दूरी के लिए बाइक या कार निकालना आवश्यक है? यदि पास की दुकान तक पैदल जाया जा सकता है तो वाहन क्यों? यदि सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध है तो अकेले वाहन लेकर सड़क पर क्यों निकलें? आज शहरों की हवा केवल उद्योगों से नहीं, बल्कि हमारी व्यक्तिगत परिवहन आदतों से भी प्रदूषित हो रही है।
नौवां कर्तव्य : भोजन का सम्मान
शादियों और समारोहों में भोजन की बर्बादी आम दृश्य बन चुकी है, लेकिन क्या हम जानते हैं कि एक थाली भोजन के पीछे कितनी जमीन, कितना पानी और कितनी ऊर्जा खर्च होती है? जब हम भोजन बर्बाद करते हैं, तो केवल अन्न नहीं फेंकते, बल्कि उन सभी संसाधनों का अपमान करते हैं जो उसे पैदा करने में लगे।
दसवां कर्तव्य : स्थानीय उत्पादों को अपनाना
क्या हमें हर मौसम में हर फल और सब्जी चाहिए? क्या स्थानीय किसानों के उत्पादों को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए? स्थानीय और मौसमी उत्पाद न केवल अधिक ताजे होते हैं, बल्कि उन्हें दूर-दूर तक ढोने में लगने वाला ईंधन और प्रदूषण भी कम होता है।
परिवार : पर्यावरण संरक्षण की पहली पाठशाला
क्या बच्चे पर्यावरण की शिक्षा केवल किताबों से सीखते हैं? बिल्कुल नहीं। वे सबसे पहले अपने माता-पिता को देखकर सीखते हैं। यदि घर में पानी की बचत होती है, यदि प्लास्टिक से बचा जाता है, यदि पेड़-पौधों की देखभाल की जाती है, तो बच्चे स्वतः इन मूल्यों को अपना लेते हैं। लेकिन यदि माता-पिता स्वयं लापरवाह हैं तो किताबों में लिखी बातें ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़तीं। आज जरूरत इस बात की है कि परिवार पर्यावरण को केवल चर्चा का विषय न बनाए, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा बनाए।
शिक्षा : क्या केवल परीक्षा पास करना ही उद्देश्य है?
हमारे स्कूलों में पर्यावरण विज्ञान पढ़ाया जाता है। बच्चे परीक्षा में अच्छे अंक भी ले आते हैं, लेकिन क्या इससे पर्यावरण के प्रति संवेदनशील नागरिक तैयार हो रहे हैं? क्या स्कूलों में बच्चों को पेड़ लगाने, वर्षा जल संचयन देखने, जैविक खाद बनाने और प्रकृति के साथ जुड़ने के अवसर दिए जा रहे हैं? शिक्षा तभी सार्थक होगी जब वह किताबों से निकलकर व्यवहार में दिखाई दे।
समाज : क्या सामाजिक दबाव बदलाव ला सकता है?
कानून हर जगह मौजूद नहीं हो सकता, लेकिन समाज हर जगह मौजूद होता है। यदि किसी मोहल्ले में कचरा सड़क पर फेंकना सामाजिक रूप से अस्वीकार्य बन जाए, यदि पानी की बर्बादी पर लोग सवाल उठाने लगें, यदि पर्यावरण-अनुकूल आयोजनों को सम्मान मिले तो क्या बदलाव तेज नहीं होगा? समाज के पास लोगों की आदतें बदलने की वह शक्ति है जो कई बार कानूनों के पास भी नहीं होती।
सबसे बड़ा सवाल : हम अपने बच्चों के लिए क्या छोड़ रहे हैं?
हम अपने बच्चों के लिए धन जमा कर रहे हैं, मकान बना रहे हैं, बीमा करा रहे हैं और भविष्य की योजनाएं बना रहे हैं, लेकिन क्या हम उनके लिए स्वच्छ हवा भी बचा रहे हैं? क्या हम उनके लिए सुरक्षित जल स्रोत छोड़ रहे हैं? क्या हम उन्हें ऐसी धरती सौंप पाएंगे, जहां वे स्वस्थ जीवन जी सकें?
शायद आने वाली पीढ़ियां हमसे यह नहीं पूछेंगी कि हमारे बैंक खातों में कितना पैसा था। वे यह जरूर पूछेंगी कि जब नदियां प्रदूषित हो रही थीं, जंगल कट रहे थे और धरती गर्म हो रही थी, तब हमने क्या किया था?
बदलाव की शुरुआत घर से
पर्यावरण संरक्षण कोई अभियान भर नहीं है। यह जीवन जीने का तरीका है। यह केवल पेड़ लगाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि सोच बदलने का आंदोलन है। हमें यह भ्रम छोड़ना होगा कि अकेले हमारे बदलने से कुछ नहीं होगा।
इतिहास गवाह है कि हर बड़ा परिवर्तन व्यक्ति से शुरू हुआ है और समाज तक पहुंचा है। आज जरूरत किसी बड़े भाषण की नहीं, बल्कि छोटे-छोटे संकल्पों की है। नल बंद करने के संकल्प की, प्लास्टिक छोड़ने के संकल्प की, पौधा लगाने और उसे बचाने के संकल्प की, भोजन का सम्मान करने के संकल्प की। धरती हमारी नहीं है।
हम केवल इसके अस्थायी संरक्षक हैं। हमें इसे अपनी आने वाली पीढ़ियों को उसी सम्मान और समृद्धि के साथ लौटाना है, जैसी हम उनसे उम्मीद करते हैं। सवाल यह नहीं है कि पर्यावरण को कौन बचाएगा। सवाल यह है कि क्या हम अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हैं?
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।