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...यहां देवता करते हैं इंसानों की समस्याओं का समाधान

नौगांव/उत्तरकाशी/ब्यूरो Updated Sat, 10 Aug 2013 11:08 PM IST
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अपनी समृद्घ संस्कृति के लिए पहचाने जाने वाले उत्तराखंड में देवी देवताओं का कितना महत्व है, यह यहां पर होने वाली धार्मिक गतिविधियों में साफ झलकता है।
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कुछ ऐसा ही शनिवार को लोगों को रुद्रेश्वर देवता की डोली के तियां गांव पंहुचने पर भी देखने को मिला। यहां ग्रामीण बहुत पहले से ही रुद्रश्वेर देवता के आगमन की तैयारियों में जुट गए थे।

उत्साह में झूमा पूरा गांव
शनिवार को जैसे ही देवता की डोली गांव की सरहद पर पंहुची क्या बच्चे, क्या महिलाएं और क्या बुजुर्ग सभी अपने भगवान को अपने बीच पाकर खुशी से नाचने लगे। फिर चाहे समय उनके आराध्य देव की डोली का गांव में आगमन हो या विदाई ग्रामीण पूरे उत्साह से अपने देव का स्वागत या विदाई में जुट जाते हैं।
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रवांई घाटी के आराध्य रुद्रेश्वर देवता के तियां गांव पहुंचने पर विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। बारिश के बावजूद भंडारे में मुगरसंती, गोडर और खाटल पट्टी के 65 गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।

सुख समृद्घि की कामना की
सुख समृद्धि की कामना के साथ मंदिर में पूजा-अर्चना तथा देव डोलियों के साथ नृत्य का दौर देर शाम तक चलता रहा। रवांई घाटी के 65 गांवों के आराध्य रुद्रेश्वर देवता बारी-बारी से एक-एक साल कंडाऊं, देवलसारी, बजलाड़ी और तियां थान में निवास करते हैं।

शुक्रवार को तियां गांव स्थित रुद्रेश्वर देवता के मंदिर में विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। शाम को मंदिर के गर्भगृह में रुद्रेश्वर देवता की मूर्ति स्थापित की गई।

नृत्य भी होता है खास
पहाड़ी हिस्सों में इस तरह के धार्मिक आयोजनों में नृत्य भी यहां की संस्कृति और परंपराओं की ही भांति खास होता है। लयबद्घ ढंग से लोग अपने देवता के आगमन की खुशी में ऐसे झूम रहे थे मानों सारा संसार उन्हें उनके छोटे से गांव में ही मिल गया हो।

पश्वा ने किया समाधान
अब एक साल तक यहीं देवता की पूजा-अर्चना होगी। देवता के पश्वा ने श्रद्धालुओं की समस्याओं का समाधान किया और उन्हें आशीर्वाद दिया।

हर गांव की अपनी पंरपरा
यह केवल उत्तरकाशी जनपद के इन 65 गांवो की ही कहानी नहीं है, बल्कि कमोबेश ऐसी ही मिलती-जुलती परंपराएं उत्तराखंड के हर पहाड़ी गांव को एक अलग पहचान देती है।

इस दौरान जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष रणवीर सिंह रावत, तियां थान मंदिर समिति के अध्यक्ष सीताराम थपलियाल, धर्म सिंह राणा, फुलक सिंह राणा, शांति थपलियाल, दयाराम थपलियाल आदि ने विशेष योगदान दिया।

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