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लाखों रुपए खर्च कर बनता है इस रेस्क्यू टीम का एक जवान

Updated Fri, 12 Feb 2016 11:55 AM IST
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हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल (हॉज) के प्रशिक्षक मेजर तरुण भट के अनुसार जब भी कभी एवलांच आता है, तो उसके लिए दो टीमें स्टैंड-बाय रहती हैं।
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एआरटी ब्रीफिंग रूम में उनका सामान हर समय उनके बैग्स में तैयार रहता है। जैसे ही हिमस्खलन होता है, तो पहले उन्हें एआरटी ब्रीफिंग रूम में ले जाकर सभी बातें स्पष्ट की जाती हैं।
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जैसे एवलांच की लोकेशन क्या है? घटनास्थल तक उन्हें कैसे पहुंचाया जाएगा? हिमस्खलन में कितने जवान दबे हुए हैं? आदि। जैसे ही यह सब बातें उन्हें पूरी तरह से स्पष्ट हो जाती हैं, तो यह जवान अपना पहले से तैयार सामान को लेते हैं और उन्हें हेलीकाप्टर या अन्य किसी साधन से घटनास्थल तक पहुंचाया जाता है।

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हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल (हॉज) के कमांडेंट मेजर जनरल नवनीत कुमार के इस स्कूल में ट्रेनिंग दी जाती है कि जवानों को हाई एल्टीट्यूड, सुपर हाई एलटीट्यूड, स्नो बाउंड या फिर ग्लेशियर वाले क्षेत्र में कैसे कार्य करना है।

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यहां जवानों की ट्रेनिंग की दो सीरीज चलती है। एक को माउंटेन वारफेयर सीरीज कहा जाता है और दूसरी विंटर वारफेयर सीरीज कहलाती है।
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माउंटेन वारफेयर ट्रेनिंग में आठ हफ्ते की इनिशियल ट्रेनिंग और चार हफ्ते की एडवांस ट्रेनिंग दी जाती है, जबकि विंटर वारफेयर ट्रेनिंग में नौ हफ्ते की इनिशियल ट्रेनिंग और तीन हफ्तों की एडवांस ट्रेनिंग दी जाती है।

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कुल मिलाकर देखें तो एक जवान को पूरी तरह से सक्षम बनाने के लिए करीब छह महीने की कठिन ट्रेनिंग दी जाती है। इस दौरान जवानों को सुपर हाई एल्टीट्यूड और ग्लेशियर एरिया में भी ले जाया जाता है, ताकि सियाचिन या फिर मिलती जुलती रणभूमि में जरूरत होने पर भेजा जा सके।

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हॉज से ट्रेनिंग पाने के बाद जवान पूरी तरह से हर चुनौती का सामना करने के लिए सक्षम हो जाता है। इतना कि माउंट एवरेस्ट पर भी चढ़ाई कर सकता है।

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इस प्रशिक्षण स्कूल में विदेशी सेना के जवान भी प्रशिक्षण लेने पहुंचते हैं। कमांडेंट मेजर जनरल नवनीत कुमार ने बताया कि यहां अमेरिका, नेपाल, श्रीलंका, सूडान आदि देशों के सैनिक और अधिकारी प्रशिक्षण ले चुके हैं।

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लांस नायक हनुमंथप्पा के बारे में मेजर जनरल नवनीत कुमार का कहना था कि इस जवान को कोई ऐसी जगह मिल गई होगी, जहां वह सांस ले पाया होगा, बाकी के जवान वैसी स्थिति में शायद न हों।

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उन्होंने कहा कि ट्रेनिंग सभी को अच्छी मिलती है। उस जवान का आत्मबल भी हो सकता है, जिसनेे उसे छह दिन तक जिंदा रखने में सहायता की होगी, क्योंकि ऐसे विनाशकारी हिमस्खलन में जिंदा बचने की गुंजाइश नहीं होती।

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जहां जिंदा रहने के कम साधन होते हैं, वहां उन परिस्थितियों में मुकाबला करने के लिए एक जवान को विशेष ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है। इसे सर्वाइवल ट्रेनिंग कहा जाता है। इस दौरान हड्डियां गला देने वाली ठंड में अपने बचाव का तरीका भी बताया जाता है।
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