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सुरों के आंगन में, समारोह की दस्तक

टीम डिजिटल/लखनऊ Updated Wed, 11 Sep 2013 08:19 AM IST
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गुलाम भारत में शास्त्रीय संगीत नवाबों व महाराजाओं के दरबारों की रौनक बन गया था। इसलिए आम लोगों की रुचि भी कम हो गई थी और संगीत उनसे कटकर लगभग खत्म हो चुका था।
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लेकिन इस दशा को संवारने और विकसित करने का श्रेय जाता है भातखण्डे संगीत समविश्वविद्यालय को आज से करीब 90 साल पहले स्थापित करने वाले पं. विष्णु नारायण भातखण्डे को। उन्होंने इसे आम लोगों के घरों तक पहुंचाया।

इसे स्थापित करने के लिए उन्होंने न केवल देशभर में संगीत शिक्षण संस्थान खोले, बल्कि संगीत को लिपिबद्घ भी किया। बुधवार से भातखण्डे जयंती समारोह शुरू हो रहा है।
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इस अवसर पर विश्वविद्यालय के स्वर-वाद्य विभागाध्यक्ष सुनील पावगी ने बताया कि वैसे तो भातखण्डे की जयंती 10 अगस्त को होती है, लेकिन उस वक्त छात्रों की संख्या कम होती है। इसलिए एक महीने बाद जब छात्र आना शुरू कर देते हैं जयंती समारोह आयोजित किया जाता है।

उन्होंने बताया कि विष्णु नारायण भातखण्डे ने घरानों की बंदिशें एकत्र कीं। शास्त्रीय संगीत को लिपिबद्घ करने का ढंग सिखाया, ताकि इसे लुप्त होने से बचाया जा सके। उन्होंने भातखण्डे संगीत समविश्वविद्यालय के अलावा ग्वालियर में माधव म्यूजिक कॉलेज और बड़ौदा में म्यूजिक स्कूल खोला।
‘अभिजात्य संगीत में रिसर्च कर रहीं लोक गायिका पूनम श्रीवास्तव बताती हैं कि भातखण्डे ने हिन्दुस्तानी संगीत को दस ठाटों में विभाजित किया। यमन, भैरवी, बिलावल, काफी, आसावरी, खमाज, पूर्वी, मारवा, तोड़ी।

जिसके जरिए संगीत को सरल, सरस व समझने योग्य बनाया। उन्हीं की बदौलत लखनऊ के गली-मुहल्लों में संगीत स्कूल खुले हुए हैं। उनकी लिखीं पुस्तक ‘भातखण्डे क्रमिक पुस्तकमालिका’ छह खण्डों में है।
पद्मभूषण हस्तियों ने यहां पढ़ायाइकलौता संगीत शिक्षण संस्थान है, जहां दर्जनभर से अधिक पद्मभूषण शिक्षकों ने छात्रों को संगीत सिखाया। इन मूर्धन्य विद्वानों में सबसे पहला नाम है पद्मभूषण पं. श्रीकृष्ण नारायण रातन जनकर(गायन), पं. गोविंद नारायण नातू(गायन), पं. वीजी जोग(वायलिन), बेगम अख्तर, उस्ताद हामिद हुसैन खां(सितार), प. सखाराम(मृदंग), सखावत हुसैन खां(सरोद), पं. मोहन राव कल्याणपुरकर(कथक), अहमद जान थिरकवा(कथक), यूसुफ अली खां(सितार) आदि शामिल हैं। मदनमोहन, अनूप जलोटा, तिमिर बरन और एसएन त्रिपाठी जैसे संगीतकार यहीं से पढ़कर निकले हैं।
भातखण्डे बनने में लगे 89 सालभातखण्डे के योगदान से वर्ष 1926 में कैसरबाग की तोपवाली कोठी में मैरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक शुरू किया। 1960 में भातखण्डे की जन्मशताब्दी पर नाम ‘भातखण्डे हिन्दुस्तानी संगीत महाविद्यालय’ किया गया। हालांकि, वर्ष 2005 में इस संगीत शिक्षक संस्थान का नाम ‘भातखण्डे संगीत सम विश्वविद्यालय’ कर दिया। मैरिस कॉलेज से भातखण्डे का सफर 89 वर्ष का है।
तीन दिन रहेगी नृत्य-संगीत की धूमभातखण्डे संगीत समविश्वविद्यालय की ओर से संत गाडगे प्रेक्षागृह में तीन दिवसीय समारोह आयोजित किया गया है। जो 11 सितम्बर से शुरू हो रहा है। उद्घाटन के बाद मुख्य अतिथि राज्यपाल बीएल जोशी पद्मभूषण कथक नृत्यांगना उमा शर्मा को गुरू सम्मान से नवाजेंगे।
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