राजधानी के सहायता प्राप्त विद्यालयों के फर्जी नियुक्ति प्रकरण में अधिकारियों की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है।
जिम्मेदार इस मामले में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाए फाइल दबाने में लगे हैं।
आलम ये है कि फर्जी नियुक्ति के बाद तैनाती लेने पहुंचे तीनों शिक्षकों के खिलाफ एफआईआर कराने के आदेश के दो महीने बाद भी मामला आगे नहीं बढ़ा पाया है।
पुलिस अधिकारियों की मानें तो, शिक्षा विभाग का कोई भी अधिकारी इसकी पैरवी करने के लिए ही सामने नहीं आया है।
माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड की जांच में राजधानी के फर्जी शिक्षकों की नियुक्ति का खुलासा हुआ था। जहां, दो सहायता प्राप्त विद्यालयों में तीन शिक्षकों को तैनात किया गया।
जिसमें, अंग्रेजी के लिए मोहम्मद शमी खां और विज्ञान के लिए प्रतिमा वर्मा व फूल सिंह कुशवाहा को तैनाती दी गई।
प्रतिमा वर्मा की तैनाती आईटी चौराहे के निकट स्थित एक ऐडेड स्कूल में की गई।
जबकि, अन्य दो को अमांवा के एक विद्यालय में भेजा गया। जब ये शिक्षक अपने आवंटित स्कूलों में पद संभालने पहुंचे, तब इस फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ।
असल में, इन शिक्षकों को जिन विद्यालयों में तैनात किया गया, वहां संबंधित पद ही उपलब्ध नहीं था।
जिस पर, विद्यालय प्रधानाचार्य ने माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड को मामला सत्यापन को भेज दिया गया। बीते मई माह में हुई जांच में इस फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ।
उधर, इस पूरे फर्जीवाड़े के खुलासे के बाद सचिव माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड की ओर से जिला विद्यालय निरीक्षक उमेश त्रिपाठी को पांच मई को पत्र जारी कर तीनों शिक्षकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के आदेश दिए गए।
लेकिन, ढ़ाई महीने से ज्यादा का समय गुजर जाने के बाद भी अभी तक इस संबंध में कार्रवाई एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाई है।
इस पूरे फर्जीवाड़े के पीछे तीन नाम सामने आए। इसमें, अछल्दा औरैया की प्रतिमा, आनंद नगर इटावा से फूल सिंह कुशवाहा और लखीमपुर खीरी से मोहम्मद शमी खां शामिल हैं।
इन दिनों को जिला स्तर के एक अधिकारी के काफी करीब बताया जा रहा है। जानकारों की मानें तो, इनमें से एक शख्स खुद को जिला स्तरीय अधिकारी की पत्नी का रिश्तेदार बताता है। सिर्फ इसीलिए, कार्रवाई की प्रक्रिया रुकी है।