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देश में हर साल 112% बढ़ रहा भ्रष्टाचार

अतुल भारद्वाज/लखनऊ Updated Thu, 28 Nov 2013 11:17 AM IST
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देश की विकास दर भले ही ऊपर-नीचे होती रही हो, लेकिन भ्रष्टाचार की विकास दर किसी भी उद्योग को मात देने वाली है।
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इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट लखनऊ के प्रो. हिमांशु राय के मुताबिक, देश में भ्रष्टाचार हर साल औसतन 112 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है।

यह आंकड़ा देश में मीडिया में उजागर हुए घोटालों की मदद से निकाला गया है।

लखनऊ मैनेजमेंट एसोसिएशन द्वारा साइंटिफिक कन्वेंशन सेंटर में हुए एक दिवसीय कन्वेंशन-2013 में ‘इथिकल लीडरशिप’ पर प्रो. हिमांशु ने प्रजेंटेशन दिया।

गलत दिशा में जा रहा नेतृत्व
प्रो. राय ने बताया, 'हमारा नेतृत्व गलत दिशा में जा रहा है। 1940 में घोटालों की वैल्यू 32 करोड़ थी। अब 2010 में यह बढ़कर 4,61,548 करोड़ पर पहुंच गई है। जीप घोटाले से शुरू होकर यह ग्रोथ राष्ट्रमंडल खेलों से होते हुए टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले तक पहुंच गई। इसके उलट अभी इसरो स्पेक्ट्रम घोटाले का आकलन होना बाकी है।'

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प्रो. राय के मुताबिक, अगर हर साल की औसत ग्रोथ आंकी जाए तो यह 112 प्रतिशत बैठती है। यह किसी भी बिजनेस कंपनी से काफी ज्यादा है।

सही प्रशिक्षण की जरूरत
इथिकल लीडरशिप की जरूरत पर जोर देते हुए उन्होंने कहा, 'हर संस्थान में आज इसकी जरूरत है। मेरा मानना है कि नैतिक जिम्मेदारी के साथ नेतृत्व को तैयार किया जा सकता है। इसके लिए सही प्रशिक्षण की जरूरत है। हमारे वेद और दूसरे ग्रंथों में बखूबी इसका मार्गदर्शन है।'
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प्रो. राय ने बताया कि यजुर्वेद और मनुस्मृति की शिक्षा इसके लिए बेहतर मार्गदर्शक है। यजुर्वेद में एक नेतृत्व के लिए साफ कहा गया है कि जिस कार्य को करने में लज्जा, भय और शंका का अनुभव हो, वह गलत है। इसके अलावा देखने और समझने की क्षमता का सही निर्वहन करना भी आना चाहिए।

मनुस्मृति में नेतृत्व धर्म
धृति (धैर्यवान होना)
क्षमा (किसी की गलती पर क्षमावान होना)
दम (इच्छाओं पर नियंत्रण)
अस्तेय (चोरी नहीं)
शौच (आध्यात्मिक स्वच्छता)
अक्रोध (गुस्से का प्रबंधन)
दीह (बुद्धिमत्ता)
विद्या (ज्ञान और जरूरी सीख)
इंद्रिय निग्रह (अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण)

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